माँ ही तो बुध
किशोर कुमार जैन
मैंने हर बार सोचा है चाँद को छु लूँसोच पर नहीं है कोई लगाममाँ कहा करती थी बेटा चाँद पर जाना नही है कोई हँसी खेलमेरे विचार भी अलग नहीं थे माँ सेमाँ मान नहीं रही और मैं विश्वास नहीं दिला पा रहाकी चाँद पर भी लोग रहेंगेमाँ विश्वास करती है स्वर्ग -नरक परपाप पुण्य पर जो मिलते है इस धरा पर स्वर्ग - नरक माँ की कल्पना नही है कहती है अच्छा करोगे तो पाओगे स्वर्ग बुरे कर्मों की बुरी है सजा, दूर इनसे रहा करो मै भी माँ की सुनता हूँमन की करता हूँ नहीं जानती इसी धरा पर मै नरक के दुख भोग रहा हूँउसके बुद्ध मन की ठेस टीस में न बदल जाएइसलिए सब भोग रहा हूँ बिना सिसकेमाँ के साथ दिन बीता रहा हूँ अपनाकष्ट सह कर भी उसकी आँखे पूछ रही होती हैकहीं कोई तकलीफ तो नहीं.
सोमवार, 14 दिसंबर 2009
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
युवाओं का जोश
कायम है उम्मीदें युवाओं के जोश पर
जिनके कन्धों पर टिका है देश का भविष्य
जलाई थी राजीब गाँधी ने एक मशाल
जिसकी रौशनी में तुम बढे चलो
बनकर एक मशाल
तुम बन जाओ एक मिशाइल
क्योंकि तुम्हारे ही कन्धों पर टिका है देश का भविष्य
राह से भटकना मत
बहकावे में आना मत
बहादूर बनकर जीना है
बनना है दीन-दुखिओं का सहारा
तुम्हारे इरादे की बुलंदी से
रहे न कोई बेसहारा
बनकर कमजोर की लाठी
बिना भेदभाव आगे बढ़ना है
क्योंकि तुम्हारे ही कन्धों पर टिका है देश का भविष्य
कदम ठिठके नहीं
मन भटके नहीं
मंजिल तुम्हे पानी है
देश के सुनहरे भविष्य के लिए
छूना है नीले अम्बर को
क्योंकि तुम्हारे कन्धों पर ही टिका है देश का भविष्य
तुम्हे बनना है पवित्र पावन
नदी के शांत निर्मल जैसा
बहते रहना है अबाध गति से
कभी न देखना पीछे मुड़कर उग्रवाद से कभी न घबराना तुम
हिंसा का करना है मुकाबला
शांति की राह पर चलकर
तुम्हे करना है पूरा
महात्मा गाँधी का सपना
क्योंकि तुम्हारे ही कंधो पर टिका है देश का भविष्य ।
किशोर कुमार जैन
जिनके कन्धों पर टिका है देश का भविष्य
जलाई थी राजीब गाँधी ने एक मशाल
जिसकी रौशनी में तुम बढे चलो
बनकर एक मशाल
तुम बन जाओ एक मिशाइल
क्योंकि तुम्हारे ही कन्धों पर टिका है देश का भविष्य
राह से भटकना मत
बहकावे में आना मत
बहादूर बनकर जीना है
बनना है दीन-दुखिओं का सहारा
तुम्हारे इरादे की बुलंदी से
रहे न कोई बेसहारा
बनकर कमजोर की लाठी
बिना भेदभाव आगे बढ़ना है
क्योंकि तुम्हारे ही कन्धों पर टिका है देश का भविष्य
कदम ठिठके नहीं
मन भटके नहीं
मंजिल तुम्हे पानी है
देश के सुनहरे भविष्य के लिए
छूना है नीले अम्बर को
क्योंकि तुम्हारे कन्धों पर ही टिका है देश का भविष्य
तुम्हे बनना है पवित्र पावन
नदी के शांत निर्मल जैसा
बहते रहना है अबाध गति से
कभी न देखना पीछे मुड़कर उग्रवाद से कभी न घबराना तुम
हिंसा का करना है मुकाबला
शांति की राह पर चलकर
तुम्हे करना है पूरा
महात्मा गाँधी का सपना
क्योंकि तुम्हारे ही कंधो पर टिका है देश का भविष्य ।
किशोर कुमार जैन
शुक्रवार, 12 जून 2009
जीवन के होते है कई रंग
जो हर पल बनते बिगड़ते रहते हैं
इन्द्रधनुष की तरह
बिजली की चमक के साथ
गरजते हुए बादलों की तरह
बरसती रहती है जिंदगी
लहराती बलखाती नदी की तरह
इठलाती है जिंदगी
पेडो में उगते नव-पल्लव
हहराती हवा में झूमते नाचते
सिखाते है जिंदगी को
एक नया सबक
उगती हुई धरती के सीने पर
खड़ी होती है जब अट्टालिकाएँ
जिंदगी बेबसी के आंसू रोती है
और जब आती है ऋतुएँ बदल-बदल कर
बदल देती है आबो हवा
बदलते रहतें है जिंदगी रंग
कभी सुख में
कभी दुःख में --
जो हर पल बनते बिगड़ते रहते हैं
इन्द्रधनुष की तरह
बिजली की चमक के साथ
गरजते हुए बादलों की तरह
बरसती रहती है जिंदगी
लहराती बलखाती नदी की तरह
इठलाती है जिंदगी
पेडो में उगते नव-पल्लव
हहराती हवा में झूमते नाचते
सिखाते है जिंदगी को
एक नया सबक
उगती हुई धरती के सीने पर
खड़ी होती है जब अट्टालिकाएँ
जिंदगी बेबसी के आंसू रोती है
और जब आती है ऋतुएँ बदल-बदल कर
बदल देती है आबो हवा
बदलते रहतें है जिंदगी रंग
कभी सुख में
कभी दुःख में --
बुधवार, 3 जून 2009
अनाहूत सपने
आजकल नए-नए सपने
खड़ी करते है परेशानी
दौड़ने लगते है अविराम
कल्पना के घोडे
ब्रह्ममुहरत के सपने
सुना था होते है सच
जाने की कितनी कोशिस
लेकिन था सब निरर्थक
डूबे जा रहा हूँ अन्धकार कुँए की
असीम गहराई में
न ही कोई धरातल
न ही कोई सहारा
फ़िर भी नहीं कोई अंत
सुख भोगता है मन
कल्पना की उड़ान में
सच मानता है मन सपनों को ही
देखता है जिन्हें जागती आँखों से
लिखता हूँ कविताएँ एक
वजूदहीन ब्यक्ति की तरह
सपनों को ही सच मानकर
वजूद खोजता हूँ अपना 0
खड़ी करते है परेशानी
दौड़ने लगते है अविराम
कल्पना के घोडे
ब्रह्ममुहरत के सपने
सुना था होते है सच
जाने की कितनी कोशिस
लेकिन था सब निरर्थक
डूबे जा रहा हूँ अन्धकार कुँए की
असीम गहराई में
न ही कोई धरातल
न ही कोई सहारा
फ़िर भी नहीं कोई अंत
सुख भोगता है मन
कल्पना की उड़ान में
सच मानता है मन सपनों को ही
देखता है जिन्हें जागती आँखों से
लिखता हूँ कविताएँ एक
वजूदहीन ब्यक्ति की तरह
सपनों को ही सच मानकर
वजूद खोजता हूँ अपना 0
गुरुवार, 7 मई 2009
ढूँढता हूँ
मैंने ढूँढा हर जगह तुमको
नहीं नजर आई तुम कहीं भी
बसंत ने बिखेर दी अपनी छटाएँ
फागुन ने बिखेरे फिजां में रंग
युहीं ऋतुएँ बितती चली गई
वक्त भी गुजरता गया
न नजरों को बिराम मिला
न मिला ठहराव
कारवें भी गुजरते चले गए
मरूभूमि की रेतीली हवा में
कोहरे की धुन्ध में
प्यासा मन घुटन से घिरा
पत्तों -पत्तों में डोल रहा मन
किसी चाह में
किसी आस में
अंतर्मन को टटोलता
ढूँढता रहा
नहीं नजर आई तुम कहीं भी
बसंत ने बिखेर दी अपनी छटाएँ
फागुन ने बिखेरे फिजां में रंग
युहीं ऋतुएँ बितती चली गई
वक्त भी गुजरता गया
न नजरों को बिराम मिला
न मिला ठहराव
कारवें भी गुजरते चले गए
मरूभूमि की रेतीली हवा में
कोहरे की धुन्ध में
प्यासा मन घुटन से घिरा
पत्तों -पत्तों में डोल रहा मन
किसी चाह में
किसी आस में
अंतर्मन को टटोलता
ढूँढता रहा
dhundhata हूँ
dhundhata रहूँगा शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
प्रेम कैसे होता है
प्रेम कैसे होता है
उपर की और सर उठाते हुए
विशाल नीले आसमान से पुछा
तारों कीऔर देखा
फ़ैल रही सूरज की किरणों से
खुली आंखों से जानना चाहा
ढूँढने गया नदी की
सुमधुर संगीत की तरह बह रही लहरों को
पागल हो रही हवाओं को
झूमते हुए पेड़ों को
आसमान में उड़ रहे काले बादलों को
अस्थिर मन
चंचल दिल
चमक रही आँखें
सब जैसे मौन हों
निस्तब्ध
नीरव
खेलती कूदती
मासूम सी बालिका
जान गई बिना पूछे
उन्मुक्त होकर खिलखिलाते हुए
लाल पड़ चुके कपोलों से
गोद में बैठकर
चुमते हुए
समझा दिया
प्रेम ऐसे होता है!!!
किशोर कुमार जैन
उपर की और सर उठाते हुए
विशाल नीले आसमान से पुछा
तारों कीऔर देखा
फ़ैल रही सूरज की किरणों से
खुली आंखों से जानना चाहा
ढूँढने गया नदी की
सुमधुर संगीत की तरह बह रही लहरों को
पागल हो रही हवाओं को
झूमते हुए पेड़ों को
आसमान में उड़ रहे काले बादलों को
अस्थिर मन
चंचल दिल
चमक रही आँखें
सब जैसे मौन हों
निस्तब्ध
नीरव
खेलती कूदती
मासूम सी बालिका
जान गई बिना पूछे
उन्मुक्त होकर खिलखिलाते हुए
लाल पड़ चुके कपोलों से
गोद में बैठकर
चुमते हुए
समझा दिया
प्रेम ऐसे होता है!!!
किशोर कुमार जैन
शनिवार, 24 जनवरी 2009
पोषक सदस्यों को अभिभावक सदस्य क्यों नहीं
बिल्कुल सही है ये सवाल। पोषक सदस्य के रूप में जो सेवाएँ ली जानी चाहिए उस तरह से उनका उपयोग नहीं लिया जा रहा। एक तरह से निराशाजनक स्थिति है । ख़ुद पोषक सदस्य भी भ्रम की स्थिति में है । सही चिंतन न होने की वजह से इस कार्य को करने में काफी मशक्कत करनी होगी चूँकि संविधान में इस तरह का कोई प्रावधान नही है।अतः मेरे विचार से एक सलाहकार के रूप में उनकी सेवाएँ ली जानी चाहिए। मंच के कार्यक्रम की सूचि में कई समितियां अलग अलग काम करती है । उनमे भी सलाहकार के रूप में उनसे मशविरा किया जाना चाहिए । इस तरह उन्हें सक्रिय बनाए रखने की पहल की जा सकती है। सामाजिक सरोकारों में उन्हें आगे रखकर उनका मार्गदर्शन लिया जा सकता है ।जब कभी समाज या इतर समाज के साथ मेल मिलाप अथवा सामाजिक संपर्क मजबूत बनाए रखने की प्रक्रिया हो तो पोषक सदस्यों की सहयोगिता बहुत लाभप्रद सिद्ध हो सकती है. किशोर कुमार जैन
बुधवार, 14 जनवरी 2009
अजय धानुका
आज मेरे लिए एक बहुत ही स्मरणीय दिन रहा । आज मेरी कबिताओं का पाठ गुवाहाटी दूरदर्शन के एनई कार्यक्रम में दिखाया गया । मैंने इस कार्यक्रम का आनंद अपने मित्र अजय धानुका के यहाँ उठाया। मेरे साथ बिशिस्त हिन्दी लेखक सावरमल संगनेरिया भी साथ थे। इसी दौरान कई लोगों से बातचीत हुई सभी ने कार्यक्रम को सराहा । इसीलिए आज का दिन मेरे लिए यादगार रहा। किशोर कुमार जैन
मंगलवार, 13 जनवरी 2009
कौन से कार्यक्रम को प्राथमिकता देने जा रही है नईसमिति
राष्ट्रीय अधिवेशन कुशलता पूर्वक सम्पन्न हो चुका है। मेजबान शाखा एक और अपनी थकान मिटने में लगी होगी तो दूसरी और नई समिति एक नई उर्जा के साथ नई रणनीति बनाने में जुटी होगी। दोनों ही बातें अपनी-अपनी जगह सही है लेकिन मेजबान शाखा का दायित्व एक तरह से इस बात के साथ ख़तम हो जाता है की उन्होंने एक नया राष्ट्रीय अध्यक्ष हमें दे दिया है और अब बाकि के समय में उसे युवा साथियों के साथ मंच दर्शन के प्रति समर्पित होकर खरा होकर दिखाना है। मंच अपने स्थापना काल से ही चुनौतियोंका सामना करते आया है और नई उसके रास्ते में खड़ी रही है। बावजूद इसके की मंच आज रजत जयंती के द्वार तक पहुँच चुका है। कुछ बातों पर पर तो तुंरत ध्यान देना जरुरी है। पहली बात के टूर पर में जिस बात कीऔर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ वह है राष्ट्रीय मुखपत्र मंचिका को पुनः अपने स्थान पर लाना । देख रहा हूँ की मंचिका अब सिर्फ़ एक स्मारिका बन कर रह गई है। जबकि एक स्मारिका और मुखपत्र में फर्क समझा जाना चाहिए। मुखपत्र के रूप में मंचिका के ऐतिहासिक गौरव की गरिमा को वापस लौटा लाने की जरुरत महशुस कर रहा हूँ। आशा है नव नेतृत्वा इस पर गहरैपूरावाकविचार करेगा । आगे फ़िर पुनः चर्चा करेंगे। किशोर कुमार जैन
२००९ सन (कविता )
एक पुराने वर्ष का अंत
और एक नए वर्ष का शुभारम्भ
आशा और प्रत्याशा का वर्ष
किसी के लिए दुःख और बिषाद का वर्ष
और किसी के लिए हर्ष और उल्लास का
आडे तिरछे चित्रों के बीच
टटोल रहा था पुरे वर्ष
शान्ति की राह
बिदाई की बेला में
२००८ सन सिसक रहा था
बेबसी में रो रहा था
शोक में टूट गया था
फ़िर भी स्वागत कर रहा था
एक नए स्वर्णिम अध्याय का
पृष्ठ खोलने के लिए
२००९ सन का
kishore kumar jain
और एक नए वर्ष का शुभारम्भ
आशा और प्रत्याशा का वर्ष
किसी के लिए दुःख और बिषाद का वर्ष
और किसी के लिए हर्ष और उल्लास का
आडे तिरछे चित्रों के बीच
टटोल रहा था पुरे वर्ष
शान्ति की राह
बिदाई की बेला में
२००८ सन सिसक रहा था
बेबसी में रो रहा था
शोक में टूट गया था
फ़िर भी स्वागत कर रहा था
एक नए स्वर्णिम अध्याय का
पृष्ठ खोलने के लिए
२००९ सन का
kishore kumar jain
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