शनिवार, 17 दिसंबर 2011

सागर सा है मन
किशोर कुमार जैन

हूँ, सोच रखा था मैंने की कुछ बन जाउंगा
लेकिन गिरते पड़ते इस जहाँ में
जहाँ डगमगा जाते हैं कदम
वहां कितना कठिन होता है
अपने आपको
टिकाए रखना
किताबों की दुनिया से निकल कर
मानों एक और दुनिया खोज ली हो
कोलंबस की तरह
लेकिन खड़े रहकर भी अपनी जानी पहचानी
जगह भी बन गई थी बेगानी

अनजाने माहौल के अजनबी लोग
पहचान तो लिया था मैंने
मतलब की दुनिया में
वे ही मुँह फेर के चल दिए
सागर की लहरे टूटती रही
बिखरती रही कहती रही
मुझे ही देख लो
कहाँ ढूँढ पाई हूँ अपना ठिकाना
मगर मेरी तलाश जारी है
मुर्दे के दिल में धड़कन ढूँढने के लिए
अपने ठिकाने की चाहत में
कोई संगम तलाश लूँगा
त्रिबेनी की तरह