बहुत दिनों तक सहेज कर रखी पीड़ा
अब सड़ना नहीं चाहती
सहनशीलता एक दंष बन गई है
जीवन जीने के लिए भी जीना पड़ता है
गुलाब के फूल काँटों में भी हँसता है
दे जाता है खुशियाँ बिन मांगे ही
गुलाबी छटाएं बिखेरती है गुलाबीपन
सरसों के खेत का पीलापन
लहलाहती फसलों की हरियाली
हर दंश मुरझा जाते है
दे जाते है जीवन का सन्देश
तुम भी चले आओ चल पड़े
बाँहों में बाह डाले
एक दूसरे में समाए
आँखों में आंख डाले
उस जहाँ की और जहाँ अहसास हो
स्वर्गीय सुख का ।
किशोर कुमार जैन
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
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