किशोर कुमार जैन
कब मेरी चेतना जागेगी
कब मेरे अंतस में फूल खिलेंगे
शूल सा बिंध रहा है
कांटो भरा ये जीवन
सम्यकदर्शन का दीप जलाकर
कर दो हे गुरूवर मेरे ह्रदय में उजाला
चौंक चौंक कर जाग रहा हूँ
उर में कब उद्भासित होगा
चेतना के दीप जलेंगे
जीवन का संताप मिटेगा
टकटोर रहा हूँ अज्ञान के अँधियारे में
हे गुरूवर पाने तेरा आशीष
टेक रहा हूँ तेरे दर पर अपना शीश
नहीं है मेरा अपना कोई इस जमाने में
न जाने बीत जाएंगे कितने युग तुम्हें पाने में
फिर भी गुरूवर पाना है तुम्हें अपने करीब
कर दो कुछ ऐसा कि भर जाए लबालब
मेरे जीवन का रिक्त दीप
मेरी नश्वर देह पाने को है बेकरार
कैसे प्राप्त करुँ श्रद्धा की बाती व समर्पण का तेल
बैठा हूँ हाथ फैलाए दे दो रत्नत्रय का उपहार
मेरे अंतस में जला दो फिर से चेतना का दीप
हो जाए हरा भरा मेरा तन मन उपवन
हो जाए क्षय मेरे पाप , कट जाए कर्म
मेरे अनंत की संभावनाओं को फिर से चमका दो
हे गुरूवर!
अब तुम ही हो मेरा सहारा
मेरी डूबती नाव की पतवार भी तुम हो
तुम हो तो जीवन है तन-मन उपवन है।
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