शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

प्रेम कैसे होता है

प्रेम कैसे होता है

उपर की और सर उठाते हुए
विशाल नीले आसमान से पुछा
तारों कीऔर देखा
फ़ैल रही सूरज की किरणों से
खुली आंखों से जानना चाहा

ढूँढने गया नदी की
सुमधुर संगीत की तरह बह रही लहरों को
पागल हो रही हवाओं को
झूमते हुए पेड़ों को
आसमान में उड़ रहे काले बादलों को

अस्थिर मन
चंचल दिल
चमक रही आँखें
सब जैसे मौन हों
निस्तब्ध
नीरव

खेलती कूदती
मासूम सी बालिका
जान गई बिना पूछे
उन्मुक्त होकर खिलखिलाते हुए
लाल पड़ चुके कपोलों से
गोद में बैठकर
चुमते हुए
समझा दिया
प्रेम ऐसे होता है!!!
किशोर कुमार जैन