सोमवार, 5 अगस्त 2024

26 जनवरी 1968 का वो मनहूस दिन

 

26 जनवरी 1968 का वो मनहूस दिन

किशोर कुमार जैन

सन 1968 की 26 जनवरी। दुखों से जुड़ा बचपन का एक दिन। तीसरी कक्षा में उत्तीर्ण होकर चौथी कक्षा में नाम लगाया था। उम्र होगी यही कोई 9 या 10 साल। कक्षा में नियमित पढ़ाई अभी शुरु नहीं हुई थी। किताबें कापियाँ खरीदकर जिल्द आदि लगाकर सब ठीक ठाक कर चुका था। 26 जनवरी को दंगा फसाद होने की कानाफूसी से पुरा गाँव आशंकित था। लेकिन क्या होगा इस बात से हमलोग अनजान थे। पिताजी चाचाजी ने बच्चों तथा महिलाओं को उस दिन घर से निकलने से मना कर रखा था। हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार था। घर में हमलोग सभी चिंतित थे।

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में स्कूल बंद था। उस दिन परिस्थिति इतनी ही चिंताजनक व उत्तेजनामय हो गई थी कि विद्यालय में हो रहे झण्डारोहन में भी हमलोग शामिल नहीं हो पाय़े। हर साल विद्यालय में गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष में स्कूल में लोजन चाकलेट व मिठाईयाँ हम छात्रों को खाने के लिए मिला करती थी। लेकिन इस बार कुछ भी न मिलने के कारण हमलोग खिन्न थे और बुरा भी लग रहा था। कुछ भी पता नहीं चल रहा था। और हमलोगों का जिज्ञासु मन कुछ जानने के लिए ब्यग्र हो ऱखा था। बिना किसी तरह का शोरगुल किए हमलोग सभी भाई बहन चुपचाप एक कमरे में डरे हुए दुबक कर बैठे हुए थे। रसोई घर में दादी माँ चाची ने हमलोगों को अचार के साथ रोटी और चाय पीने के लिए दी थी।

इसी से हमलोगो ने अनुमान कर लिया था कि पिताजी, चाचा और गाँव के लोग इकठ्ठे होकर आने वाली परिस्थिति के बारे में विचार विमर्श कर रहे थे। गुवाहाटी के फैंसी बाजार के नदी किनारे (बर्तमान का महात्मा गाँधी पथ पूर्व मे स्ट्राण्ड रोड के नाम से परिचित) हमलोगों की एक दूकान है जिसमें पिताजी हमेशा गाँव से आना जाना किया करते थे। उस समय तक हमलोगों का गुवाहाटी में कोई  घर नहीं था। 26 जनवरी के दिन पिताजी गुवाहाटी न जाकर गाँव में ही थे। गाँव की दुकाने व बाजार खुले थे लेकिन लोगों का आवागमन कम था। गाँव के सभी लोग किसी अनजानी आशंका में डुबे हुए थे कि उसी समय गुवाहाटी के मारवाड़ी इलाके में कुछ गंडोगोल होने की खबर गाँव में फैल गई थी।

गुवाहाटी के पश्चिम दिशा में 32 किलोमीटर की दूरी पर कामरुप जिले के दक्षिण में एयरपोर्ट से11कि.मी. के नजदीक हमलोगों का गाँव अवस्थित है। प्रकृति की सारी बाधाओं को दूर कर गाँव की स्थापना की गई थी इसीलिए गाँव का नाम विजयनगर रखा गया। जिस स्थान मे गाँव की स्थापना की गई था वंहा पहले एक मरघट था और लोग दिन में भी उस जगह आने से डरते थे। विजयनगर की स्थापना के पहले गाँव वासी पलाशबाड़ी नामक एक टाऊन में रहा करते थे। उस समय पलाशबाड़ी असम का सबसे पुराना और बड़ा शहर व एक ब्यापारिक केन्द्र था। सन 1950 के बृहद भूकंप के बाद यंहा की भौगोलिक परिस्थिति मे बेहद बदलाव आ गया। ब्रह्मपुत्र नद का कटाव शुरु हो गया। लोगों में इस बात को लेकर काफी चर्चा हो रही थी कि नद ने अपनी गति बदल ली थी। ब्रह्मपुत्र के प्रबल कटाव के कारण पलाशबाड़ी शहर के घर-बार, दूकान बाजार नदी के सीने में डूब गए। यद्यपि मेरा जन्म पलाशबाड़ी में नहीं हुआ था। लेकिन माँ-पिताजी, दादी,चाचा आदि के मुँह से ये बातें सुना करता था। मेरा जन्म हुआ था नये बसे विजयनगर में। यंहा हमलोगों के मकान सट कर बने हुए थे। लकड़ी और टीन के बने हुए ये मकान आसाम टाइप मकान कहे जाते थे। सभी के मकान में आगे के हिस्से में दुकान व पीछे रहने के लिए मकान बने हुए थे। हमलोगों का मकान भी कुछ इसी तरह से बना हुआ था कि हमलोग बिना सड़क के भी एक घर से अगले कई घरों के बाद सड़क पर आते थे।

26 जनवरी का वो भयावह दिन जिसकी याद आते ही आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। गला रुन्ध जाता है। भूलना चाहकर भी भूल नहीं सकता। अगर प्राकृतिक कारणों से या बदकिस्मती से घर जलता तो एक अलग बात होती। लेकिन ये घटना तो ऐसी थी कि कुछ बदमाश प्रकृति के लोगों द्वारा या दंगाईयों ने बैमनस्यता का भाव रखते हुए घर जलाया था जिसमें हमने अपना सबकुछ खो दिया था। इस बात में या उस बात में आकाश पाताल का फर्क था। सांप्रदायिक संघर्ष के फल स्वरुप देश में आज  भी ऐसी घटनांए घट रही है। आदमी आदमी के प्रति कैसे इतना निर्मम और निष्ठुर हो जाता है कारणों का विश्लेशण कर पता लगाया जा सकता है। उस दिन अपराह्र दो बजे के बाद सड़क पर शोरगुल होने की बात सुनाई दी। सुनने में आया कि विजयनगर के चौराहे पर दो ट्रक भरकर लड़के आए थे और उन्होंने गाँववासियो के साथ मारपीट शुरु कर दी। और मुख्य सड़क के किनारे के दो घरों में आग भी लगा दी। ठीक थोड़ी देर बाद ही हमारी दुकान का दरवाजा कुछ लड़के जोर जोर से ठकठकाने लगे। दरवाजा तोड़ने की भरपूर कोशिश के बावजूद तोड़ नहीं पाए। इतने में हमलोगों ने देखा कि दुकान के अंदर से आग की लपटें आसमान को छूने लगी। हमलोगों की छाती धड़कने लगी। हमलोग चीख चीखकर रोने लगे।  घर में हमलोग छोटे बड़े सभी दुकान से सटे कमरे से बाहर निकलकर घर के पिछवाड़े की तरफ भागकर अपनी जान बचाई। थोड़ी देर में ही हमारी दुकान से सटी अन्य चार पाँच दुकाने भी एक साथ धुँ धुं कर जलने लगी। ये आग हमारी बदनसीबी या प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं जल रही थी। बल्कि एक षड़यंत्र के तहत दंगाईयों द्वारा जलाई जा रही थी। विजयनगर में शांतिपूर्वक रह रहे लोगों को षड़यंत्र पूर्वक विजयनगर आसाम से खदेड़ने के उद्देश्य से डराने धमकाने के लिए इसतरह का अमानवीय कार्य किया गया था। हमारी दुकान से शुरु होकर आगे की पाँच दुकानों तक लगी आग के कारण आसमान में आग की लपटों के साथ साथ काला धुँवा फैल गया था।

जनवरी महीने के अंत में हालांकि कड़कड़ाती ठण्ड नहीं थी लेकिन दिन में गरमी और रात ठण्डी रहती थी। हमारे घर के पिछवाड़े से मुख्य सड़क तक जाने के लिए एक छोटी सी गली बनी हुई थी। वो दिन हमलोगों के लिए सौभाग्य का भी दिन था कि हमारे पिछवाड़े वाले मकान में आग नहीं लगाई गई थी अन्यथा हमलोगों के लिए बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता भी बंद हो जाता। और उससे अलग हमलोगों की क्या हालत होती यह सोचकर ही शरीर में झुरझुरी फैल जाती है। आगे से भी आग और पीछे से भी आग और बीच में हमलोगों का परिवार ,कल्पनातीत था वो भयानक मंजर। क्रमवार तरीके से बनाई गई दुकानों में से पाँच दुकानों के बाद छठे मकान के बीच पांच फुट का एक गेप था। पाँचो मकान में आग लगाने का बाद वे उस छठे मकान में भी कुछ लड़के आग लगाना चाहते थे लेकिन उस परिवार की एक महिला ने अपने साहस का प्रदर्शन करते हुए उन लड़कों के मुँहपर मिर्ची का गुड़ा फेंकना शुरु कर दिया। उन लोगों की आँखों पर जैसे ही मिर्ची की जलन लगी वे लोग इधर उधर भागने लगे। इतने में दुकानों में रखे पटाखे जब आग से जलने लगे तो भड़ाम धड़ाम की आवाजें आने लगी। दंगाइयों को लगा की पुलिस ने गोली चार्ज करना शुरु कर दिया है के डर के मारे वे लोग जैसे तैसे अपनी गाड़ियों मे बैठकर भागने लगे। दंगाइयों के भागने के बाद हमलोग भी घर के पिछवाड़े की गली से मुख्य सड़क से निकल कर पास के नव निर्मित टेलीफोन केन्द्र के एक कमरे में जाकर शरण ली। उस समय उस केन्द्र का मुख्य प्रभारी तिवारी था जिसने हमलोगों की खुब मदद की। बाद में जब भी तिवारी जी से मुलाकात होती तो मैं उन्हें सिर झुकाकर नमस्कार किया करता था। बाद में असम के एक उग्रवादी संगठन ने उनपर गैर सामाजिक कार्यों का अभियुक्त करार देकर गोली मारकर हत्या कर दी जिससे इलाके में कई दिनों तक सनसनी फैली रही।

दिन भर डर से थकान और रो रो कर आँखें लाल हो गई थी, कुछ खाया भी था क्या य़ाद भी नहीं आ रहा था। मच्छरों के काटने तथा छोटी जगह होने के कारण ठीक से नींद भी नहीं आई थी। मैंने सिर्फ हाफ पेंट व एक शर्ट पहन रखा था। लेकिन अगले दिन सुरज निकलते ही हमलोग घर पँहुच गए थे। सामने रह कर प्रत्यक्षतौर पर जली हुई दुकानों का मंजर देखकर फिर से रोना आ गया। चारों तरफ जलने की गँध और पानी मिश्रित खाद्य सामग्रीयों की बदबू हवा में फैली हुई थी। गाँववासियों के चेहरे पर फैली हुई थी उदासीनता। सबके चेहरे पर अनिद्रा की झलक, बाल उलझे हुए और लुंगी बनियान पहने हुए थे और एक दूसरे से मिल रहे थे। दुकान के बगल से निकलने वाले एक छोटे से रास्ते से हमलोग दुकान के पीछे ही बने घर मे हमलोग गए। विजयनगर की बसावट ही कुछ इस तरह की थी कि सभी के दुकान व मकान एक साथ आगे पीछे थे। इन्हें असमिया लोग केंया गोला कहा करते थे। दुकान का सारा माल जल गया था। ऊपर लगी हुई टीने सब मुचड़ गई थी, इधर उधर फैली हुई कहीं कहीं लकड़ियों के टुकड़े अभी भी सुलग रहे थे। चारों तरफ पानी और कीचड़ था। घर की महिलांए और माँ सीधे सीधे रसोईघर की तरफ चली गई और साफ सफाई के कामों में लग गई तथा  खाना बनाने की तैयारियों मे लग गई। दुकान से सटे हुए कमरे में ही हमारे कपड़े लत्ते व स्कूल की किताब कापियाँ थी। रोना चाहकर भी न रो पाने की स्थिति हो गई थी हमलोगों की। भर्राये हुए गले से अंगुलियों के इशारे से क्या कहना चाहता था वो इस वक्त याद नहीं आ रहा है। सब कुछ पल भर में ही नष्ट होगया। कुछ भी नहीं बचाया जा सका। पहने हुए कपड़े ही मेरे अंतिम वस्त्र थे। घर के लोग और दुकान के कर्मचारी सारे सामान को समेटने में संभालने मे  लगे हुए थे। हम सभी छोटे लोग एक कमरे में बैठे एक दूसरे की तरफ ताकते हुए चुपचाप बैठे हुए थे। आग के प्रचण्ड ताप में वजनी तिजोरी के अंदर रखे कागज व रुपये तथा चांदी का सामान आदि भी जलकर खाक हो गए थे।

अगले दिन गाँव में सुबह से ही हलचल मचने लगी। दोपहर 12बजे के बाद परिस्थिति कुछ शांत हुई। गुवाहाटी से आई हुई सेनावाहिनी को नियुक्त किया गया। पलाशबाड़ी थाना की पुलिस भी सक्रिय हुई। गाँव के अंदर आने वाले रास्ते व बाहर निकलने वाले रास्ते को बाँस का गेट बनाकर बंद कर दिया गया। आने जाने वालों की तलाशी करके ही जाने दिया जाता। रसोई घर के बरामदे में बैठकर माँ व अन्य ने हमें चाय रोटी खाने के लिए दी। खाने के बाद ही शरीर को कुछ ताकत मिली। दुकान के पिछली तरफ बने मकान को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था सिर्फ दुकान का सामान ही इधर उधर बिखरा हुआ पड़ा हुआ था। हमारी दुकान की अंतिम सीमा जोकि कम से कम 50 फुट थी के बाद से शुरु होता था हमारा मकान। घर की छत दुकान की छत के साथ जुड़ी हुई नहीं थी। अर्थात बीच के हिस्से में लकड़ी का एक दो तला मकान बना हुआ था उसको कोई नुकसान नहीं हुआ था। सिर्फ ऊपर जाने के लिए बनी हुई सीढ़ी का निचला हिस्सा जल गया था। दो तले मकान के नीचे दो कमरे तथा उसके ऊपर दो कमरे बने हुए थे। उसके पीछे बने हए टिन के मकान में एक बड़ा सा हाल बना हुआ था और घर के पिछवाड़े तक जाने के लिए गली बनी हुई थी। हाल के साथ एक स्टोर रुम तथा बगल में रसोई घर बनी हुई थी। रसोई घर के करीब ही एक चापाकल तथा एक पुराना कुआँ बना हुआ था। उस कुँए से पानी खराब आने लगा था जिसकी वजह से उसे बंद कर दिया गया था, लेकिन उस दिन उसका मुंह खुला हुआ था। उससे ही आग बुझाने के लिए बाल्टियाँ भर भर कर पानी लिया गया था। मुसीबत के समय उस पुराने कुँए के पानी ने  हमारा खूब साथ दिया था।

बिजयनगर में हमारी दुकान सबसे बड़ी दुकान मानी जाती थी। हमारी दुकान में गल्लामाल के अलावा कपड़े,गंजी बनियान,पूजा पाठ का सामान,गजाल, सीमेन्ट,यँहा तक कि नाटक भाउना की पोशाक आदि भी पाई जाती थी। नाटक में काम आने वाली पोशाक के अलावा तलवार कवच आदि अनेको सामान आस-पास के गाँव वाले किराए में ले जाया करते थे। आसपास के गावं के लोगों में  हमलोगों की दुकान दादाजी गौरीलालसेर की दुकान के नाम से बहुत ही कम समय में विख्यात हो गई थी। बिजय नगर इलाके में लगी आग को बुझाने में मदद करने वाला हमारी संप्रदाय के लोगों के अलावा कोई नहीं था। मुटिया मजदूरी करने वाले कुछ बिहारी लोगों ने भी इस कार्य में हमलोगों की मदद की थी। कुछ वे लोग भी थे  जो मदद करने के बहाने कीमती सामान लुटने में ही अपनी दिलचस्पी दिखाई थी। उनमें कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने सामान को बचाकर वापस देकर अपनी इमानदारी का भी परिचय दिया। हमारे घर के बगल में एक कच्चा सिनेमाघर भी था। जो कि गाँव के कुछ युवा उद्यमियों द्वारा नवयुवक संघ के नाम से श्री दिगम्बर जैन स्कूल की सहायतार्थ चलाया जाता था। सिनेमा हाल पूर्णतया जलकर राख हो गया था।

ऐसे कठिन समय में इस बात को लेकर भी मैं काफी असहज महसूस कर रहा था कि कुछ अजनबी लोग आकर हमारी दुकाने और घर जलाकर चले गए लेकिन आसपास के रहने वाले गांव के लोग जिनके साथ हमलोगों के घनिष्ठ सम्पर्क बन गए थे,एक साथ पढ़े लिखे, खेले कूदे और आपद-विपद मे एक दूसरे के काम आने का उदाहरण भी थे उन लोगों में से कोई भी हमलोगों की मदद करने नहीं आया था। बल्कि दंगाइयों की मदद करने के लिए दो एक लोग उनलोगों का साथ दिया था यह भी हमलोगों की नजर में आया था। उनमें से गाँव के एक परिवार के लोगों को एक स्थानीय परिवार ने आश्रय देने से भी मना कर दिया। आग लगने के कारण बिजली की लाइन काट दिये जाने के कारण चारों तरफ अँधेरा छा गया था। एक आदमी ने लालटेन देकर मदद करने से भी इनकार कर दिया। सहानुभूति का प्रदर्शन करने वाले लोगों की कमी होने के बावजूद कुछ लोग खाने के लिए चावल सब्जी आदि लेकर आए और मदद की।

धीरे-धीरे गाँव में फैल रही उत्तेजना शांत हो रही थी। दो तीन दिनों बाद स्कूल खुल गई थी। कपड़े किताब कापियों के अभाव में मैं स्कूल नहीं जा रहा था। एक दिन मेरे दो सहपाठी जबरन स्कूल लेकर गए। शरीर पर पहने कपड़े काफी गंदे हो गए थे। सभी मुझे सहानुभूति की नजरों से देख रहे थे, इसका मुझे सहज ही अनुमान हो गया था। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई और मेरा मुंह रोने का सा हो गया था। मास्टर जी ने सह्रदयतापूर्वक मुझे रोज स्कूल आने के लिए कहा था। सहपाठी से किताब लेकर पढ़ने की सलाह दी। मास्टर जी की सहानुभूति के कारण मेरी आँखें छलछला गई। गला रुन्ध गया था और उस दिन मैं स्कूल में फूट फूट कर रोने लगा।

हमारे गाँव और गुवाहाटी में हुई इस घटना ने असम और भारत के विभिन्न राज्यों में हड़कम्प मचा दिया। पंजाब, हरियाणा,राजस्थान के मुख्यमंत्री,केन्द्रीय गृहमंत्री और कई सांसद घटना की जानकारी व घटना स्थल का जायजा लेने के लिए दौरा कर रहे थे। असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिमला प्रसाद चालिहा,गृहमंत्री महेन्द्रमोहन चौधरी तथा अन्य विधायक व असम सरकार के कई  विशिष्ट अधिकारी ,पुलिस विभाग के कई अधिकारी ,जिला उपायुक्त आदि आकर डेरा लगाते थे। विभिन्न राजनैतिक दल के नेता लोगों का भी उन दिनों आना जाना रहा। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया व असम के मुख्यमंत्री के बीच इस बात को लेकर काफी वाद-विवाद भी हुआ था। राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने उस वक्त जयपुर के विख्यात चाँदपोल बाजार में जमीन देने का प्रस्ताव भी दिया। बाहर से आए हुए प्रतिनिधियों ने बातचीत के दौरान यंहा कि महिलाओं और पुरुषों की असमिया मिश्रित हिंदी सुनकर पकड़ नहीं पाए कि हमलोग मुल रुप से हिंदी भाषी हैं या असमिया भाषी। असम सरकार ने विजयनगर वासियों को आर्थिक अनुदान देने का प्रस्ताव दिया था जिसे लोगों ने अस्वीकार कर दिया। अंत में सरकार ने कम ब्याज पर ऋण देने की बात की जिसे लोगों ने स्वीकार कर लिया। लगभग एक साल तक सेना छावनी बनाकर वहां रही। हमारी जमीन पर हम कई सालों तक नया मकान नहीं बन पाया। बैकल्पिक तौर पर पुरानी दुकान के सामने एक दूसरी जगह किराए में लेकर दुकान शुरु की।

हमारी दादीजी की आलमारी में रखे रुपये अधजली हालत में पाये गए। चुंकि रुपयों के नम्बर बिना जली अवस्था में रह गए थे अतः वे रुपये बदल दिये गए। बदले गए रुपयें में हमें एक नोट हजार रुपया का मिला। जोकि न सिर्फ हमलोगों के लिए बल्कि गाँववालों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बने रहे। उन दिनों आग का बीमा करने का प्रचलन था या नहीं मुझे पता नहीं,लेकिन जिन लोगों की दुकानें जली थी उनमें से किसी का बीमा नहीं था। गांव में पुनः नयी दुकान मकान बनने लगे। बिजयनगर वासियों के धैर्य लगन व परिश्रम के कारण दक्षिण कामरुप के प्रधान ब्यवसायिक केन्द्र के रुप में प्रतिष्ठित होने में ज्यादा समय नहीं लगा।

26 जनवरी की इस घटना के बारे में असम के सर्वाधिक प्रचलित असमिया अखबार अंग्रेजी अखबार क्रमशःदैनिक असम व आसाम ट्रिब्युन में प्रकाशित हुआ भी था या नहीं या फिर इस घटना को संवाद  माध्यम ने किस तरह लिया इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। आज भी जब किसी के घरमें आग लगती है या किसी बाजार में आग लगती है तो मेरी आँखों के सामने उभर आता है वो खतरनाक दिल दहलानेवाला दृश्य जो मैंने नौ-दस साल की उम्र में देखा था। 1987 सन में फैंसीबाजार के म्युनिसिपल मार्केट में भयंकर आग लगी थी जिसमें सैकड़ों दुकाने व हजारों लोग बेराजगार हो गए थे। लेकिन वो आग किन्ही दुर्बृतों दवारा नहीं लगाई गई थी। आकस्मिक दुर्घटनाजनित कारणों से लगी थी जिसमें छोटे-छोटे दुकानदार सर्वश्रांत हो गए थे उनलोगों के लिए वो एक भयावह स्मृति थी।

उल्लेखनीय है कि 26 जनवरी के इस भयावह काण्ड की जाँच के लिए एक जांच आयोग का भी गठन किया गया था ऐसा गाँव के लोग कह रहे थे। किसी किसी की गवाही भी ली गई थी।लेकिन उस प्रतिवेदन की रिपोर्ट का क्या हुआ था पता नहीं शायद सरकारी पाकचक्र में वही हाल हुआ होगा जो होता आया है। सन् 1968 में असम की राजनीति मे एक भूचाल आया था। उन दिनों असम की राजधानी शिलांग में थी। असमिया और खाशियों के बीच एक विभेदकारी शक्तियां सक्रिय हो रही थी। मेघालय राज्य में असम से अलग होने की मांग जोरों से पकड़ रही थी। राजनीति के इस षड़यंत्र की असम की जनता में काफी प्रतिक्रिया ब्यक्त की जा रही थी। राजनीति के इस षड़यंत्र से पीछा छुड़ाने व जनता का इस मुद्दे पर से ध्यान बँटाने के लिए इस तरह की घटना का सूत्रपात होने के बारे में लोगों में प्रतिक्रिया चल रही थी। कई महीनों तक इसकी चर्चा असम की आबोहवा में गुंजती रही।