कब तक ढूंढता रहूंगा
कविः किशोर कुमार जैन
हां ये सच ही है
तलाश किसी की पूरी नहीं होती
और तो और ये साल भी गुजर गया
फिर भी खोजता रहता है मन
बाजार में,पार्क में, राह चलते, सिनेमा हाल में
अखबार में,किताब में, शास्त्र में
और न जाने कंहा-कंहा
और नये साल की शुभ बेला में
चांद की ओर ताकते हुए
सूरज की तपन में तपते हुए
बारिस की शीतल बौछार में
वैश्वायन की हवा में कहीं
अपने आप ही उङता चला आये
इसी आस में ताकता रहा आसमां को
आखिर कहीं तो अंत होगा
कहीं तो कुछ मिलेगा
शायद कोई फकीर ही बता दे
या फिर किसी भिखारी को ही पुछ लूं
उङता हुवा पक्षी भी तो कुछ जानता होगा
एक हसीना ने कहा मेरे सौंदर्य मे खोज लो
साधु ने कहा शायद मेरी तपस्या में मिल जाए
कवि ने कहा कविता मे भी तो हो सकता है
होने को तो किस्से-कहानियों में भी तो हो सकता है
लेकिन तनाव भरी जिंदगी में कुछ भी तो ठीक नहीं रहता
तलाश तो ताजिंदगी जारी रहेगी
किसी एक में या अनेक में........
इस साल नहीं तो अगले साल
शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
न लौटे कभी पर लौट कर आए नया साल
किशोर कुमार जैन
बीत गया वो सब कुछ जो पुराना था साल
अब तो सब कुछ नया-नया होगा
पुराने में भी कुछ नया था
नये में और भी नया होगा
दुख भरे उन क्षणों को भुलकर
सुख भरे उन क्षणों को याद करना है
उसी में अतीत अपनी खिङकींया खोल देगा
हवा के झोंके मे फङफङाता रहेगा
इतिहास का वो काला पन्ना
आसमान से सुरज की किरणें चमकेंगी
दे जाएगी सर्दी में गर्मी का अहसास
हवा के शीतल झोंके से शरीर ठिठुर जाएगा
उसी ठिठुरन में सिकुङती ये देह
पल-पल याद करेगी तुम्हारी उपस्थिति का अहसास
हर वक्त नयापन देगा प्रेम का वो ahsas
कैसे भूल जाऊं नये साल में
पुराने साल का सुख भरा इतिहास
रंग बिरंगे फूलों में बस रही वो महक
कभी न खत्म हो किसी भी दहशत में
खुन से बिखरी सङक में खिले वो फूल
कभी न याद दिलाए वो रक्ताक्त मंजरपीछे मुङकर न देखुं
बीते हुए समय को नये साल मे सब कुछ नया हो हे नये साल
फङफहाते हुए वो पन्ने भले ही उङ जाए
न लौटे कभी वो पर लौट कर आए नया साल
किशोर कुमार जैन
बीत गया वो सब कुछ जो पुराना था साल
अब तो सब कुछ नया-नया होगा
पुराने में भी कुछ नया था
नये में और भी नया होगा
दुख भरे उन क्षणों को भुलकर
सुख भरे उन क्षणों को याद करना है
उसी में अतीत अपनी खिङकींया खोल देगा
हवा के झोंके मे फङफङाता रहेगा
इतिहास का वो काला पन्ना
आसमान से सुरज की किरणें चमकेंगी
दे जाएगी सर्दी में गर्मी का अहसास
हवा के शीतल झोंके से शरीर ठिठुर जाएगा
उसी ठिठुरन में सिकुङती ये देह
पल-पल याद करेगी तुम्हारी उपस्थिति का अहसास
हर वक्त नयापन देगा प्रेम का वो ahsas
कैसे भूल जाऊं नये साल में
पुराने साल का सुख भरा इतिहास
रंग बिरंगे फूलों में बस रही वो महक
कभी न खत्म हो किसी भी दहशत में
खुन से बिखरी सङक में खिले वो फूल
कभी न याद दिलाए वो रक्ताक्त मंजरपीछे मुङकर न देखुं
बीते हुए समय को नये साल मे सब कुछ नया हो हे नये साल
फङफहाते हुए वो पन्ने भले ही उङ जाए
न लौटे कभी वो पर लौट कर आए नया साल
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