सोमवार, 5 अगस्त 2024

26 जनवरी 1968 का वो मनहूस दिन

 

26 जनवरी 1968 का वो मनहूस दिन

किशोर कुमार जैन

सन 1968 की 26 जनवरी। दुखों से जुड़ा बचपन का एक दिन। तीसरी कक्षा में उत्तीर्ण होकर चौथी कक्षा में नाम लगाया था। उम्र होगी यही कोई 9 या 10 साल। कक्षा में नियमित पढ़ाई अभी शुरु नहीं हुई थी। किताबें कापियाँ खरीदकर जिल्द आदि लगाकर सब ठीक ठाक कर चुका था। 26 जनवरी को दंगा फसाद होने की कानाफूसी से पुरा गाँव आशंकित था। लेकिन क्या होगा इस बात से हमलोग अनजान थे। पिताजी चाचाजी ने बच्चों तथा महिलाओं को उस दिन घर से निकलने से मना कर रखा था। हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार था। घर में हमलोग सभी चिंतित थे।

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में स्कूल बंद था। उस दिन परिस्थिति इतनी ही चिंताजनक व उत्तेजनामय हो गई थी कि विद्यालय में हो रहे झण्डारोहन में भी हमलोग शामिल नहीं हो पाय़े। हर साल विद्यालय में गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष में स्कूल में लोजन चाकलेट व मिठाईयाँ हम छात्रों को खाने के लिए मिला करती थी। लेकिन इस बार कुछ भी न मिलने के कारण हमलोग खिन्न थे और बुरा भी लग रहा था। कुछ भी पता नहीं चल रहा था। और हमलोगों का जिज्ञासु मन कुछ जानने के लिए ब्यग्र हो ऱखा था। बिना किसी तरह का शोरगुल किए हमलोग सभी भाई बहन चुपचाप एक कमरे में डरे हुए दुबक कर बैठे हुए थे। रसोई घर में दादी माँ चाची ने हमलोगों को अचार के साथ रोटी और चाय पीने के लिए दी थी।

इसी से हमलोगो ने अनुमान कर लिया था कि पिताजी, चाचा और गाँव के लोग इकठ्ठे होकर आने वाली परिस्थिति के बारे में विचार विमर्श कर रहे थे। गुवाहाटी के फैंसी बाजार के नदी किनारे (बर्तमान का महात्मा गाँधी पथ पूर्व मे स्ट्राण्ड रोड के नाम से परिचित) हमलोगों की एक दूकान है जिसमें पिताजी हमेशा गाँव से आना जाना किया करते थे। उस समय तक हमलोगों का गुवाहाटी में कोई  घर नहीं था। 26 जनवरी के दिन पिताजी गुवाहाटी न जाकर गाँव में ही थे। गाँव की दुकाने व बाजार खुले थे लेकिन लोगों का आवागमन कम था। गाँव के सभी लोग किसी अनजानी आशंका में डुबे हुए थे कि उसी समय गुवाहाटी के मारवाड़ी इलाके में कुछ गंडोगोल होने की खबर गाँव में फैल गई थी।

गुवाहाटी के पश्चिम दिशा में 32 किलोमीटर की दूरी पर कामरुप जिले के दक्षिण में एयरपोर्ट से11कि.मी. के नजदीक हमलोगों का गाँव अवस्थित है। प्रकृति की सारी बाधाओं को दूर कर गाँव की स्थापना की गई थी इसीलिए गाँव का नाम विजयनगर रखा गया। जिस स्थान मे गाँव की स्थापना की गई था वंहा पहले एक मरघट था और लोग दिन में भी उस जगह आने से डरते थे। विजयनगर की स्थापना के पहले गाँव वासी पलाशबाड़ी नामक एक टाऊन में रहा करते थे। उस समय पलाशबाड़ी असम का सबसे पुराना और बड़ा शहर व एक ब्यापारिक केन्द्र था। सन 1950 के बृहद भूकंप के बाद यंहा की भौगोलिक परिस्थिति मे बेहद बदलाव आ गया। ब्रह्मपुत्र नद का कटाव शुरु हो गया। लोगों में इस बात को लेकर काफी चर्चा हो रही थी कि नद ने अपनी गति बदल ली थी। ब्रह्मपुत्र के प्रबल कटाव के कारण पलाशबाड़ी शहर के घर-बार, दूकान बाजार नदी के सीने में डूब गए। यद्यपि मेरा जन्म पलाशबाड़ी में नहीं हुआ था। लेकिन माँ-पिताजी, दादी,चाचा आदि के मुँह से ये बातें सुना करता था। मेरा जन्म हुआ था नये बसे विजयनगर में। यंहा हमलोगों के मकान सट कर बने हुए थे। लकड़ी और टीन के बने हुए ये मकान आसाम टाइप मकान कहे जाते थे। सभी के मकान में आगे के हिस्से में दुकान व पीछे रहने के लिए मकान बने हुए थे। हमलोगों का मकान भी कुछ इसी तरह से बना हुआ था कि हमलोग बिना सड़क के भी एक घर से अगले कई घरों के बाद सड़क पर आते थे।

26 जनवरी का वो भयावह दिन जिसकी याद आते ही आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। गला रुन्ध जाता है। भूलना चाहकर भी भूल नहीं सकता। अगर प्राकृतिक कारणों से या बदकिस्मती से घर जलता तो एक अलग बात होती। लेकिन ये घटना तो ऐसी थी कि कुछ बदमाश प्रकृति के लोगों द्वारा या दंगाईयों ने बैमनस्यता का भाव रखते हुए घर जलाया था जिसमें हमने अपना सबकुछ खो दिया था। इस बात में या उस बात में आकाश पाताल का फर्क था। सांप्रदायिक संघर्ष के फल स्वरुप देश में आज  भी ऐसी घटनांए घट रही है। आदमी आदमी के प्रति कैसे इतना निर्मम और निष्ठुर हो जाता है कारणों का विश्लेशण कर पता लगाया जा सकता है। उस दिन अपराह्र दो बजे के बाद सड़क पर शोरगुल होने की बात सुनाई दी। सुनने में आया कि विजयनगर के चौराहे पर दो ट्रक भरकर लड़के आए थे और उन्होंने गाँववासियो के साथ मारपीट शुरु कर दी। और मुख्य सड़क के किनारे के दो घरों में आग भी लगा दी। ठीक थोड़ी देर बाद ही हमारी दुकान का दरवाजा कुछ लड़के जोर जोर से ठकठकाने लगे। दरवाजा तोड़ने की भरपूर कोशिश के बावजूद तोड़ नहीं पाए। इतने में हमलोगों ने देखा कि दुकान के अंदर से आग की लपटें आसमान को छूने लगी। हमलोगों की छाती धड़कने लगी। हमलोग चीख चीखकर रोने लगे।  घर में हमलोग छोटे बड़े सभी दुकान से सटे कमरे से बाहर निकलकर घर के पिछवाड़े की तरफ भागकर अपनी जान बचाई। थोड़ी देर में ही हमारी दुकान से सटी अन्य चार पाँच दुकाने भी एक साथ धुँ धुं कर जलने लगी। ये आग हमारी बदनसीबी या प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं जल रही थी। बल्कि एक षड़यंत्र के तहत दंगाईयों द्वारा जलाई जा रही थी। विजयनगर में शांतिपूर्वक रह रहे लोगों को षड़यंत्र पूर्वक विजयनगर आसाम से खदेड़ने के उद्देश्य से डराने धमकाने के लिए इसतरह का अमानवीय कार्य किया गया था। हमारी दुकान से शुरु होकर आगे की पाँच दुकानों तक लगी आग के कारण आसमान में आग की लपटों के साथ साथ काला धुँवा फैल गया था।

जनवरी महीने के अंत में हालांकि कड़कड़ाती ठण्ड नहीं थी लेकिन दिन में गरमी और रात ठण्डी रहती थी। हमारे घर के पिछवाड़े से मुख्य सड़क तक जाने के लिए एक छोटी सी गली बनी हुई थी। वो दिन हमलोगों के लिए सौभाग्य का भी दिन था कि हमारे पिछवाड़े वाले मकान में आग नहीं लगाई गई थी अन्यथा हमलोगों के लिए बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता भी बंद हो जाता। और उससे अलग हमलोगों की क्या हालत होती यह सोचकर ही शरीर में झुरझुरी फैल जाती है। आगे से भी आग और पीछे से भी आग और बीच में हमलोगों का परिवार ,कल्पनातीत था वो भयानक मंजर। क्रमवार तरीके से बनाई गई दुकानों में से पाँच दुकानों के बाद छठे मकान के बीच पांच फुट का एक गेप था। पाँचो मकान में आग लगाने का बाद वे उस छठे मकान में भी कुछ लड़के आग लगाना चाहते थे लेकिन उस परिवार की एक महिला ने अपने साहस का प्रदर्शन करते हुए उन लड़कों के मुँहपर मिर्ची का गुड़ा फेंकना शुरु कर दिया। उन लोगों की आँखों पर जैसे ही मिर्ची की जलन लगी वे लोग इधर उधर भागने लगे। इतने में दुकानों में रखे पटाखे जब आग से जलने लगे तो भड़ाम धड़ाम की आवाजें आने लगी। दंगाइयों को लगा की पुलिस ने गोली चार्ज करना शुरु कर दिया है के डर के मारे वे लोग जैसे तैसे अपनी गाड़ियों मे बैठकर भागने लगे। दंगाइयों के भागने के बाद हमलोग भी घर के पिछवाड़े की गली से मुख्य सड़क से निकल कर पास के नव निर्मित टेलीफोन केन्द्र के एक कमरे में जाकर शरण ली। उस समय उस केन्द्र का मुख्य प्रभारी तिवारी था जिसने हमलोगों की खुब मदद की। बाद में जब भी तिवारी जी से मुलाकात होती तो मैं उन्हें सिर झुकाकर नमस्कार किया करता था। बाद में असम के एक उग्रवादी संगठन ने उनपर गैर सामाजिक कार्यों का अभियुक्त करार देकर गोली मारकर हत्या कर दी जिससे इलाके में कई दिनों तक सनसनी फैली रही।

दिन भर डर से थकान और रो रो कर आँखें लाल हो गई थी, कुछ खाया भी था क्या य़ाद भी नहीं आ रहा था। मच्छरों के काटने तथा छोटी जगह होने के कारण ठीक से नींद भी नहीं आई थी। मैंने सिर्फ हाफ पेंट व एक शर्ट पहन रखा था। लेकिन अगले दिन सुरज निकलते ही हमलोग घर पँहुच गए थे। सामने रह कर प्रत्यक्षतौर पर जली हुई दुकानों का मंजर देखकर फिर से रोना आ गया। चारों तरफ जलने की गँध और पानी मिश्रित खाद्य सामग्रीयों की बदबू हवा में फैली हुई थी। गाँववासियों के चेहरे पर फैली हुई थी उदासीनता। सबके चेहरे पर अनिद्रा की झलक, बाल उलझे हुए और लुंगी बनियान पहने हुए थे और एक दूसरे से मिल रहे थे। दुकान के बगल से निकलने वाले एक छोटे से रास्ते से हमलोग दुकान के पीछे ही बने घर मे हमलोग गए। विजयनगर की बसावट ही कुछ इस तरह की थी कि सभी के दुकान व मकान एक साथ आगे पीछे थे। इन्हें असमिया लोग केंया गोला कहा करते थे। दुकान का सारा माल जल गया था। ऊपर लगी हुई टीने सब मुचड़ गई थी, इधर उधर फैली हुई कहीं कहीं लकड़ियों के टुकड़े अभी भी सुलग रहे थे। चारों तरफ पानी और कीचड़ था। घर की महिलांए और माँ सीधे सीधे रसोईघर की तरफ चली गई और साफ सफाई के कामों में लग गई तथा  खाना बनाने की तैयारियों मे लग गई। दुकान से सटे हुए कमरे में ही हमारे कपड़े लत्ते व स्कूल की किताब कापियाँ थी। रोना चाहकर भी न रो पाने की स्थिति हो गई थी हमलोगों की। भर्राये हुए गले से अंगुलियों के इशारे से क्या कहना चाहता था वो इस वक्त याद नहीं आ रहा है। सब कुछ पल भर में ही नष्ट होगया। कुछ भी नहीं बचाया जा सका। पहने हुए कपड़े ही मेरे अंतिम वस्त्र थे। घर के लोग और दुकान के कर्मचारी सारे सामान को समेटने में संभालने मे  लगे हुए थे। हम सभी छोटे लोग एक कमरे में बैठे एक दूसरे की तरफ ताकते हुए चुपचाप बैठे हुए थे। आग के प्रचण्ड ताप में वजनी तिजोरी के अंदर रखे कागज व रुपये तथा चांदी का सामान आदि भी जलकर खाक हो गए थे।

अगले दिन गाँव में सुबह से ही हलचल मचने लगी। दोपहर 12बजे के बाद परिस्थिति कुछ शांत हुई। गुवाहाटी से आई हुई सेनावाहिनी को नियुक्त किया गया। पलाशबाड़ी थाना की पुलिस भी सक्रिय हुई। गाँव के अंदर आने वाले रास्ते व बाहर निकलने वाले रास्ते को बाँस का गेट बनाकर बंद कर दिया गया। आने जाने वालों की तलाशी करके ही जाने दिया जाता। रसोई घर के बरामदे में बैठकर माँ व अन्य ने हमें चाय रोटी खाने के लिए दी। खाने के बाद ही शरीर को कुछ ताकत मिली। दुकान के पिछली तरफ बने मकान को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था सिर्फ दुकान का सामान ही इधर उधर बिखरा हुआ पड़ा हुआ था। हमारी दुकान की अंतिम सीमा जोकि कम से कम 50 फुट थी के बाद से शुरु होता था हमारा मकान। घर की छत दुकान की छत के साथ जुड़ी हुई नहीं थी। अर्थात बीच के हिस्से में लकड़ी का एक दो तला मकान बना हुआ था उसको कोई नुकसान नहीं हुआ था। सिर्फ ऊपर जाने के लिए बनी हुई सीढ़ी का निचला हिस्सा जल गया था। दो तले मकान के नीचे दो कमरे तथा उसके ऊपर दो कमरे बने हुए थे। उसके पीछे बने हए टिन के मकान में एक बड़ा सा हाल बना हुआ था और घर के पिछवाड़े तक जाने के लिए गली बनी हुई थी। हाल के साथ एक स्टोर रुम तथा बगल में रसोई घर बनी हुई थी। रसोई घर के करीब ही एक चापाकल तथा एक पुराना कुआँ बना हुआ था। उस कुँए से पानी खराब आने लगा था जिसकी वजह से उसे बंद कर दिया गया था, लेकिन उस दिन उसका मुंह खुला हुआ था। उससे ही आग बुझाने के लिए बाल्टियाँ भर भर कर पानी लिया गया था। मुसीबत के समय उस पुराने कुँए के पानी ने  हमारा खूब साथ दिया था।

बिजयनगर में हमारी दुकान सबसे बड़ी दुकान मानी जाती थी। हमारी दुकान में गल्लामाल के अलावा कपड़े,गंजी बनियान,पूजा पाठ का सामान,गजाल, सीमेन्ट,यँहा तक कि नाटक भाउना की पोशाक आदि भी पाई जाती थी। नाटक में काम आने वाली पोशाक के अलावा तलवार कवच आदि अनेको सामान आस-पास के गाँव वाले किराए में ले जाया करते थे। आसपास के गावं के लोगों में  हमलोगों की दुकान दादाजी गौरीलालसेर की दुकान के नाम से बहुत ही कम समय में विख्यात हो गई थी। बिजय नगर इलाके में लगी आग को बुझाने में मदद करने वाला हमारी संप्रदाय के लोगों के अलावा कोई नहीं था। मुटिया मजदूरी करने वाले कुछ बिहारी लोगों ने भी इस कार्य में हमलोगों की मदद की थी। कुछ वे लोग भी थे  जो मदद करने के बहाने कीमती सामान लुटने में ही अपनी दिलचस्पी दिखाई थी। उनमें कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने सामान को बचाकर वापस देकर अपनी इमानदारी का भी परिचय दिया। हमारे घर के बगल में एक कच्चा सिनेमाघर भी था। जो कि गाँव के कुछ युवा उद्यमियों द्वारा नवयुवक संघ के नाम से श्री दिगम्बर जैन स्कूल की सहायतार्थ चलाया जाता था। सिनेमा हाल पूर्णतया जलकर राख हो गया था।

ऐसे कठिन समय में इस बात को लेकर भी मैं काफी असहज महसूस कर रहा था कि कुछ अजनबी लोग आकर हमारी दुकाने और घर जलाकर चले गए लेकिन आसपास के रहने वाले गांव के लोग जिनके साथ हमलोगों के घनिष्ठ सम्पर्क बन गए थे,एक साथ पढ़े लिखे, खेले कूदे और आपद-विपद मे एक दूसरे के काम आने का उदाहरण भी थे उन लोगों में से कोई भी हमलोगों की मदद करने नहीं आया था। बल्कि दंगाइयों की मदद करने के लिए दो एक लोग उनलोगों का साथ दिया था यह भी हमलोगों की नजर में आया था। उनमें से गाँव के एक परिवार के लोगों को एक स्थानीय परिवार ने आश्रय देने से भी मना कर दिया। आग लगने के कारण बिजली की लाइन काट दिये जाने के कारण चारों तरफ अँधेरा छा गया था। एक आदमी ने लालटेन देकर मदद करने से भी इनकार कर दिया। सहानुभूति का प्रदर्शन करने वाले लोगों की कमी होने के बावजूद कुछ लोग खाने के लिए चावल सब्जी आदि लेकर आए और मदद की।

धीरे-धीरे गाँव में फैल रही उत्तेजना शांत हो रही थी। दो तीन दिनों बाद स्कूल खुल गई थी। कपड़े किताब कापियों के अभाव में मैं स्कूल नहीं जा रहा था। एक दिन मेरे दो सहपाठी जबरन स्कूल लेकर गए। शरीर पर पहने कपड़े काफी गंदे हो गए थे। सभी मुझे सहानुभूति की नजरों से देख रहे थे, इसका मुझे सहज ही अनुमान हो गया था। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई और मेरा मुंह रोने का सा हो गया था। मास्टर जी ने सह्रदयतापूर्वक मुझे रोज स्कूल आने के लिए कहा था। सहपाठी से किताब लेकर पढ़ने की सलाह दी। मास्टर जी की सहानुभूति के कारण मेरी आँखें छलछला गई। गला रुन्ध गया था और उस दिन मैं स्कूल में फूट फूट कर रोने लगा।

हमारे गाँव और गुवाहाटी में हुई इस घटना ने असम और भारत के विभिन्न राज्यों में हड़कम्प मचा दिया। पंजाब, हरियाणा,राजस्थान के मुख्यमंत्री,केन्द्रीय गृहमंत्री और कई सांसद घटना की जानकारी व घटना स्थल का जायजा लेने के लिए दौरा कर रहे थे। असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिमला प्रसाद चालिहा,गृहमंत्री महेन्द्रमोहन चौधरी तथा अन्य विधायक व असम सरकार के कई  विशिष्ट अधिकारी ,पुलिस विभाग के कई अधिकारी ,जिला उपायुक्त आदि आकर डेरा लगाते थे। विभिन्न राजनैतिक दल के नेता लोगों का भी उन दिनों आना जाना रहा। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया व असम के मुख्यमंत्री के बीच इस बात को लेकर काफी वाद-विवाद भी हुआ था। राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने उस वक्त जयपुर के विख्यात चाँदपोल बाजार में जमीन देने का प्रस्ताव भी दिया। बाहर से आए हुए प्रतिनिधियों ने बातचीत के दौरान यंहा कि महिलाओं और पुरुषों की असमिया मिश्रित हिंदी सुनकर पकड़ नहीं पाए कि हमलोग मुल रुप से हिंदी भाषी हैं या असमिया भाषी। असम सरकार ने विजयनगर वासियों को आर्थिक अनुदान देने का प्रस्ताव दिया था जिसे लोगों ने अस्वीकार कर दिया। अंत में सरकार ने कम ब्याज पर ऋण देने की बात की जिसे लोगों ने स्वीकार कर लिया। लगभग एक साल तक सेना छावनी बनाकर वहां रही। हमारी जमीन पर हम कई सालों तक नया मकान नहीं बन पाया। बैकल्पिक तौर पर पुरानी दुकान के सामने एक दूसरी जगह किराए में लेकर दुकान शुरु की।

हमारी दादीजी की आलमारी में रखे रुपये अधजली हालत में पाये गए। चुंकि रुपयों के नम्बर बिना जली अवस्था में रह गए थे अतः वे रुपये बदल दिये गए। बदले गए रुपयें में हमें एक नोट हजार रुपया का मिला। जोकि न सिर्फ हमलोगों के लिए बल्कि गाँववालों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बने रहे। उन दिनों आग का बीमा करने का प्रचलन था या नहीं मुझे पता नहीं,लेकिन जिन लोगों की दुकानें जली थी उनमें से किसी का बीमा नहीं था। गांव में पुनः नयी दुकान मकान बनने लगे। बिजयनगर वासियों के धैर्य लगन व परिश्रम के कारण दक्षिण कामरुप के प्रधान ब्यवसायिक केन्द्र के रुप में प्रतिष्ठित होने में ज्यादा समय नहीं लगा।

26 जनवरी की इस घटना के बारे में असम के सर्वाधिक प्रचलित असमिया अखबार अंग्रेजी अखबार क्रमशःदैनिक असम व आसाम ट्रिब्युन में प्रकाशित हुआ भी था या नहीं या फिर इस घटना को संवाद  माध्यम ने किस तरह लिया इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। आज भी जब किसी के घरमें आग लगती है या किसी बाजार में आग लगती है तो मेरी आँखों के सामने उभर आता है वो खतरनाक दिल दहलानेवाला दृश्य जो मैंने नौ-दस साल की उम्र में देखा था। 1987 सन में फैंसीबाजार के म्युनिसिपल मार्केट में भयंकर आग लगी थी जिसमें सैकड़ों दुकाने व हजारों लोग बेराजगार हो गए थे। लेकिन वो आग किन्ही दुर्बृतों दवारा नहीं लगाई गई थी। आकस्मिक दुर्घटनाजनित कारणों से लगी थी जिसमें छोटे-छोटे दुकानदार सर्वश्रांत हो गए थे उनलोगों के लिए वो एक भयावह स्मृति थी।

उल्लेखनीय है कि 26 जनवरी के इस भयावह काण्ड की जाँच के लिए एक जांच आयोग का भी गठन किया गया था ऐसा गाँव के लोग कह रहे थे। किसी किसी की गवाही भी ली गई थी।लेकिन उस प्रतिवेदन की रिपोर्ट का क्या हुआ था पता नहीं शायद सरकारी पाकचक्र में वही हाल हुआ होगा जो होता आया है। सन् 1968 में असम की राजनीति मे एक भूचाल आया था। उन दिनों असम की राजधानी शिलांग में थी। असमिया और खाशियों के बीच एक विभेदकारी शक्तियां सक्रिय हो रही थी। मेघालय राज्य में असम से अलग होने की मांग जोरों से पकड़ रही थी। राजनीति के इस षड़यंत्र की असम की जनता में काफी प्रतिक्रिया ब्यक्त की जा रही थी। राजनीति के इस षड़यंत्र से पीछा छुड़ाने व जनता का इस मुद्दे पर से ध्यान बँटाने के लिए इस तरह की घटना का सूत्रपात होने के बारे में लोगों में प्रतिक्रिया चल रही थी। कई महीनों तक इसकी चर्चा असम की आबोहवा में गुंजती रही।

शनिवार, 2 जुलाई 2016

हे[K1]  गुरूवर

किशोर कुमार जैन

कब मेरी चेतना जागेगी
कब मेरे अंतस में फूल खिलेंगे
शूल सा बिंध रहा है
कांटो भरा ये जीवन
सम्यकदर्शन का दीप जलाकर
कर दो हे गुरूवर मेरे ह्रदय में उजाला

चौंक चौंक कर जाग रहा हूँ
उर में कब उद्भासित होगा
चेतना के दीप जलेंगे
जीवन का संताप मिटेगा
टकटोर रहा हूँ अज्ञान के अँधियारे में
हे गुरूवर पाने तेरा आशीष
टेक रहा हूँ तेरे दर पर अपना शीश

नहीं है मेरा अपना कोई इस जमाने में
न जाने बीत जाएंगे कितने युग तुम्हें पाने में
फिर भी गुरूवर पाना है तुम्हें अपने करीब
कर दो कुछ ऐसा कि भर जाए लबालब
मेरे जीवन का रिक्त दीप

मेरी नश्वर देह पाने को है बेकरार
कैसे प्राप्त करुँ श्रद्धा की बाती व समर्पण का तेल
बैठा हूँ हाथ फैलाए दे दो रत्नत्रय का उपहार
मेरे अंतस में जला दो फिर से चेतना का दीप
हो जाए हरा भरा मेरा तन मन उपवन
हो जाए क्षय मेरे पाप , कट जाए कर्म
मेरे अनंत की संभावनाओं को फिर से चमका दो
हे गुरूवर! अब तुम ही हो मेरा सहारा
मेरी डूबती नाव की पतवार भी तुम हो
तुम हो तो जीवन है तन-मन उपवन है।
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संपर्कः 098640 63790 गुवाहाटी असम








 [K1]

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

सागर सा है मन
किशोर कुमार जैन

हूँ, सोच रखा था मैंने की कुछ बन जाउंगा
लेकिन गिरते पड़ते इस जहाँ में
जहाँ डगमगा जाते हैं कदम
वहां कितना कठिन होता है
अपने आपको
टिकाए रखना
किताबों की दुनिया से निकल कर
मानों एक और दुनिया खोज ली हो
कोलंबस की तरह
लेकिन खड़े रहकर भी अपनी जानी पहचानी
जगह भी बन गई थी बेगानी

अनजाने माहौल के अजनबी लोग
पहचान तो लिया था मैंने
मतलब की दुनिया में
वे ही मुँह फेर के चल दिए
सागर की लहरे टूटती रही
बिखरती रही कहती रही
मुझे ही देख लो
कहाँ ढूँढ पाई हूँ अपना ठिकाना
मगर मेरी तलाश जारी है
मुर्दे के दिल में धड़कन ढूँढने के लिए
अपने ठिकाने की चाहत में
कोई संगम तलाश लूँगा
त्रिबेनी की तरह

रविवार, 29 मई 2011

मेरे पापा

पापा आत्मप्रशंसा से हमेशा दूर रहे. उन्होने कभी डींगे नहीं हाँकी. बलिक यह तक भी अपने पुँह से जतलाने की कोशिस तक नहीं कि विजयनगर के नव निर्माण में उनका कितना योगदान रहा है. पापा अब 80 के ऊपर चल रहे है. पापा जब 12 साल के थे तभी उनके कंधो पर पूरे परिवार की जिम्मदारी आ पङी थी। उनके तीन छोटे भाई तथा 6 बहने हैं। 12 साल की उम्र में पिताजी गौरीलाल जी साया उठ गया था। लेकिन जीवन का संघर्ष करने में कभी हार नहीं मानी. परिवार की जिम्मेदारी के साथ साथ उन्होंने समाज के कार्यों में भी अपना भरपूर योगदान दिया। इलाके के सभी लोगों में वे लोकप्रिय थे। भाईयों को स्थापित किया बहनों की शादी की फिर अपने पांच बेटों दो बेटिंया भाईयों के बेटे बेटियों की चिंता में उन्होंने अपने सारी उम्रगुजार दी। कई बर्षों तक वे उपरहाली हाईस्कूल की प्रबंधकारिणी समिति के सरकारी प्रतिनिधि थे। विजयनगर के मंदिर,स्कूल,धर्मशाला,औषधालय आदि के निर्माण में भी उनका सहयोग रहा। कई बर्षों तक वे श्री दिगंबर जैन स्कूल की की ब्यवस्थापना समिति के मंत्री व अध्यक्ष बने रहे. सरकारी कागज पत्रों मे वे आज भी विजयनगर की समाज के एकमेव मंत्री हैं जब कि आध्यक्ष मे किसी नाम दर्ज नहीं है। 1976 व 1978 में विजयनगर में हुए ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के निर्विवाद तौर पर मंत्री पद पर काम किया . कक्षा 4 तक पढे पापा का एकाउंट्स का काम भी गजब का रहा. हिसाब किताब के काम में कहीं कोई गफलत नहीं की थी। लेकिन कभी किसी तरह के सम्मान के वे लालसी थे न ही आग्रही थे. पापा निरहंकारी है।.आत्मस्वाभिमानी है। न तो अपने ब्यापार में उन्होने किसी तरह की कोई बेईमानी की सहारा लिया। भाईयों के प्रति भी वे इमानदार बने रहे। अपने हिस्से के प्रति न सोचते हुए पहले भाईयों के लिए ही सबकुछ करते रहे।
पापा एक सांस्कृतिक कर्मी भी थे . बचपन में वे नाटकों में भी भाग लिया करते थे.अपने जीवन में उन्होने कई उतार चढाव का बी सामना किया। पलाशबाङी में दो बार उनका मकान ब्रह्मपुत्र की भेंट चढ गया। एक बार भीषण आग से बी वे तबाह हो गए थे। फिर दादाजी ने जब विजयनगर की स्थापना की। तब विजयनगर के विकास में बी वे लगे रहे. सन 1968 में दंगाईयों की चपेट एकबार फिर पापा ने सब कुछ खो दिया. लेकिन बिना घबराए अपने परिवार के साथ घाँव वालों की हिम्मत बंधाते रहे. 1950 के हुए विनाशकारी भूकंप के भी वे प्रत्यक्षदर्शी हैं।
कई बार उनहोंने छोटे बङे तीर्थों की दुर्गम परिस्थतियों में यात्राएं की है. यात्रा के दौरान उनके रोमांचकारी अनुभवों को सुनकर हमलोग दांतो तले उंगलिया दबा लेते हैं। आज की सहज होती यात्रा को देखते हुए पहले की यात्रा के बारे में सुनकर अचरज सा लगता है. वर्तमान के सामान की कीमत को देखकर वे भी यह अंदाज लगा लेते है कि दुनिया कँहा से कँहा पँहुच गई। समाज मे आसपास के गाँवो में उनका एक दबदबा था. आज की युवा पीढी के नैतिक स्खलन को देखकर उम्हें दुख होता है. युवावों को सामाजिक कार्यों के लिए वे उत्साहित करते हैं.कभी भी उन्होंने किसी काम में हस्तक्षेप भी नहीं किया,दखलंदाजी नहीं की. सरकारी अफसरों से उनकी अच्छी पैठ होते हुे भी कभी नाजायज फायदा नहीं उठाया. समाज के कामों में सरकारी मदद लेने में कभी गुरेज भी नहीं किया। दादाजी के सिध्दांत दे होबो दे को वे आज भी मानते है. धैर्य व शांति के साथ वे अपना काम भी करते रहे और लोगों के सलाह भी देते रहे.

रविवार, 15 मई 2011

बेमतलब गुजरता है जीवन
किशोर कुमार जैन

ओह उलझ सा गया हूँ मानसिक जंजालो मे
मकङी के जाल में फंसे पतंगे की तरह
अनसुलझी समस्याओं मे
पानी में उठते भँवर ने
धकेल दिया है पाताल में

सागर की लहरों के थपेङों सी
उतर चढ रही है जिंदगी
किसी एक पङाव की तलाश में
बहते जा रहें हैं जीवन के सातों रंग
धुंधलाती आंखो में झलक रहे हैं सपने
भंग होती आशाओं की तरह.

दो पहियों पर जीवन की गाङी
डगमगाती चलती जा रही है
टूटी-फूटी सङकों पर उद्देश्यविहीन
जीवन का मतलब खोजते
जिंदगी बन गयी है खण्डहर

पहाङ की तलहटी में गिरता हुवा झरना
बौछारे छिङकता पानी
दे देता है जीवन को एक नया रुप
उङता हुवा गुलाल
छोङ जाता है जीवन का बुढाता सौंदर्य.



बुधवार, 15 दिसंबर 2010

ओह फिर एक नया साल

किशोर कुमार जैन

ओह फिर एक नया साल

मेरी दहलीज में कदम रख रहा है

जाने किस चाह में

इस साल तो कल्पना की थी

संकल्प भी लिया था

कि गुजारुंगा शांति और क्षमा भाव से

लेकिन महंगाई की मार ने कर दिया सब चौपट

नहीं संभाल पाया अपने आपको

गुस्से और अधीरता ने

तिरोहित कर दी मेरी भावनांए

जो देती थी मुझे हौंसला

एक के बाद एक मिली घोटाले की

खबरों ने छीन लिया चैन

शान से कमाया नाम खेल कूद में

लेकिन भ्रष्टाचार ही रहा शीर्ष पर

जिस में अव्वल रहे हम

आसमान भी छुएंगे

नापेंगे पाताल की गहराई

देगे दुनिया को सबसे बड़ा बाजार

भूखे नंगे देश में योंहि सब चलता रहेगा

हर साल नये साल का धूम-धड़ाका

हमारे कानों में गूंजता रहेगा

चमक दमक के सामने चुंधियाती रहेगी आंखे

साल फिर भी बदल जाएगा

नए संकल्प अधुरे सपनों के साथ

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

बांगलादेशी समस्या एक बार फिर सुर्खियों में

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बांग्लादेशी दुष्चक्र के बारे में अबतक गहराई से किए गए चिंतन का प्रभावशाली लेख असम के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे वरिष्ठ बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने परामर्श दिए हैं। भारत आनेवाले अवैध बांग्लादेशी की संख्या में निरंतर वृद्धि होने के बावजूद राष्टृीय दलों द्वारा अनदेखी किया जाना सचमुच चिंता का विषय है। अगप के असम की राजनीति में प्रवेश का यही एकमात्र मुद्दा था। लेकिन शासन में होने के बावजूद भी जटिल कानूनी प्रक्रिया के कारण वे लोग कुछ भी नहीं कर पाए जो उनकी बेबसी को दर्शाता है। आसू के आंदोलन का उस पक्ष की विफलता नें असम की जनता को हताश व निराश किया है। समस्या के संदर्भ में कई कारणों का सही मायनों में उचित मूल्यांकन न होने के कारण समस्या ज्यों की त्यों पड़ी है । अवैध बांग्लादेशीयों को मताधिकार से वंचित कर देने से इस समस्या से कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है लेकिन यह काम प्रशासन का है । इसके लिए राजनीतिक दलों को एक सर्वसम्मत निर्णय लेना पड़ेगा। देश की अखंडता को भी भविष्य में अगर खतरा हो सकता है तो इन्हीं अवैध बांग्लादेशियों से ही हो सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस बात को लेकर कोई चिंतित न हो लेकिन चुनाव आते ही सभी दल अपनी-अपनी रोटियां सेंकने में लग जाते है। यद्यपि आसू इस मुद्दे पर जागरुक है लेकिन राजनैतिक आकाओं की शतरंजी चाल के आगे हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। यह सोचना बिलकुल उचित और सटीक है कि बातचीत के माध्यम से कोई भी समस्या हल की जा सकती है। यदि वे लोग जिन पर इस समस्या को हल करने की जिम्मेवारी है वे उसे राष्टृीय समस्या समझकर अगर हल करना चाहें तो।
लेकिन जिस गति से इस दिशा में काम हो रहा है उससे तो यही लगता है कि समस्या का समाधान ढूंढते-ढूंढते हजारों साल गुजर जाएंगे। तब तक अवैध बांग्लादेशी राजनैतिक दृष्टि से इतने मजबूत हो जाएंगे कि उन्हें अपनी सरकार बनाने से भी कोई नहीं रोक पाएगा। हालांकि इस बात की आशंका व्यक्त होनी शुरु हो गई है। असम जैसे राज्य में अनेकों समस्याएं हैं अतः एक अवैध घुसपैठियों की समस्या से जनता को भुलावे में रखने के लिए अन्य समस्याओं को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। केंद्र सरकार का रवैया भी इस मामले को लेकर उदासीन है। सरकारी तंत्र में एक राशन कार्ड बनाने में कितनी तरह की छानबीन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है यह सर्वविदित है फिर एक अवैध नागरिक की पहचान क्यों नहीं हो सकती? यह सच है कि किसी भी अवैध बांग्लादेशी को अगर पुलिस पकड़ भी ले तो राजनैतिक हलकों में हायतौबा मच जाती है,ऐसे में पुलिस वाले अपनी नौकरी बचाने को तरजीह देते हुए आंखे मुंद लेने में ही भलाई समझती है। जब राजस्थान में सिलसिलेवार बम विस्फोट हुए तब बांग्लादेशियों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया । आसू इस बार राजनैतिक बहकावे में न आकर इमानदारी से अगर जनता को विश्वास में लेकर रणनीति तैयार करे तो कुछ आशाजनक परिणाम हासिल कर सकती है। आनेवाले दिनों में असम में विधान सभा के चुनाव होंगे बांगलादेशीयों के मताधिकार को लेकर फिर से गरना-गरम बहस शुरु हो चुकी है। असंभावित ़रुप से मतदाताओं की संख्या मे हुई वृद्धि को लेकर राजनैतिक हलकों में सुगबुगाहट शुरु हो चुकी है। असम की जनता भी इसे सहज रुप में नहीं ले पा रही है। लेकिन जिम्हें इससे फायदा होगा वे इसके बचाव में आगे आएंगे इसमें कोई शक नहीं है। इस तरह समस्या एक विकराल रुप लेगी। समय रहते इस विषय पर चिंता करना जरुरी है।
असम विभिन्न भाषा-भाषीयों तथा विभिन्न जनगोष्ठियों का राज्य है। अतः इन सभी को साथ में लेकर आसू को सम्मिलित प्रयास करना होगा। असम की अखंडता में कहीं भेदभाव का बीज बोने वले फिर से सक्रिय न हो इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा। असम में बढते अवैध नागरिकों की संख्या को देखते हुए अन्य प्रांतो से भी समर्थन मिलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। असम आंदोलन के दौरान हुई गलतियां पुनः न दोहराई जाए इस बात पर भी नजर रखनी होगी। सांप्रदायिक हिंसा से बचते हुए सामग्रिक रूप से अहिंसात्मक तरीकों से अपनी समस्याओं से जनता को अवगत कराना होगा। अपनी पुरानी गलती से सबक लेकर ही नए सिरे से उचित मार्ग अपनाना होगा। और अंत में,आपका कहना बिल्कुल सही है कि अब तक निराशावादी बन चुके असमवासियों की आंखों में एक बार फिर आशा की किरण दिखाई दी है- शायद इस बार कुछ हो जाए। अगर इस बार चुक गए तो फिर समस्या को और अधिक विकराल होने से कोई नहीं बचा सकता। मौके का फायदा उठाने में ही समझदारी है। समय रहते सचेत हो जाने से देश की अखंडता को सुरक्षित रखा जा सकता है।
किशोर कुमार जैन महात्मागांधी पथ फैंसीबाजार गुवाहाटी -1