गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

अधिवेशन की गूँज सारे भारत में सुनाई दे

जानकर प्रशन्नता हुई की अधिवेशन का आगाज हो चुका है.बहुत ही खुशिओं का माहौल छाया होगा.निगाहें ताकती होंगी नए पुराने चेहरों को.अधिवेशन लेकर आता है एक बिस्तृत प्रतिवेदन जिससे पता चलता है की सखाओं ने बिगत तीन सालों में क्या किया और क्या नहीं। बारी आती है नव नेत्रित्व को चुनने की,नए बिचारों की भविष्य के नीतियों के चयन की.यात्रा की थकान लिए युवा सदस्य उत्फुल्लित हो गए होंगे आयोजक शाखा की तैयारियों को देखकर.आख़िर इतने बड़े आयोजन की तैयारियों को अपने कन्धों पर जा उठाया है। बधाई के पात्र हैं वे.वे भी तो चाहेंगे की युवा साथी एक नया अनुभव,एक नई सोच,एक ऐसे निर्णय के साथ लौटें जो उनकी शाखा के लिए भी फलदायक हों। मंच की अब तक की कमियां दूर हो,उन कार्यों को पुरा कराने का निर्णय लें जाओ किसि न किसी कारन से संभव नही हो पाए हों.१) राजनीती के क्षेत्र में मारवाडी समाज की भूमिका,२)मंच के मुख पात्र के रूप में मंचिका का पुनः प्रकाशन,३) मेरा मंच वेब साईट को जारी व मान्यता प्रदान,४)साधारण सदस्यों के साथ आपसी बिचारों की प्रक्रिया में तेजी,५)मारवाडी कला साहित्य संस्कृति का प्रचार प्रसार.,६) स्थानीय समस्या के ऊपर राजनैतिक बिचार धाराओं से पुस्ता बर्तालाप.............. जिस तरह कुम्भा के मेले में लोग पवित्रता की भावनाओं से सराबोर होकर लौटते है उसी तरह युवा साथी भी इस महाकुम्भा से मीठी यादें लेकर अनुप्राणित होकर लौटें इसी कामना के साथ ॥ अधिवेशन से मरहम..........किशोर कुमार जैन।

सोमवार, 17 नवंबर 2008

मंच की भलाई ही सर्वोपरी है

मंच से मेरा गहरा लगाव है । क्योंकि मंच ने मुझे बहुत कुछ दिया है। जितना कुछ मंच से मुझे मिला है उतना मैंने मंच को नहीं दिया है । यह बात कहने अगर मैं संकोच करता हूँ तो कृतघ्नता होगी। इसलिए दुखी हो जाता हूँ जब कोई मंच के बारे में बुरा भला कहने की कोशिश करता है। लेकिन मैं इस बात से भी परेशां होता हूँ जब कूछ सवाल जो की मंच हित में रखे जाएँ और उनका सही-सही जवाब नहीं मिले। मंच आज भी अपनी लय और गति से आगे बढ़ रहा है यह जानकर खुशी होती है। मंच ने समय को पहचाना है और उसी के साथ चलने की कोशिश भी करता है,फ़िर भी पता नहीं क्यों अनचाहे ही संबाद हीनता की स्थिति आ जाती है। बिनोद रिंगानिया एक समझदार एवं जागरूक पत्रकार है । मंच के प्रति उन्होंने हमेशा ही एक सद्भावना के तहत अपने विचार ब्यक्त किए हैं। अधिवेशन को लेकर उनके uthae गए सवालों को सवाल न मानकर अगर नीति निर्धारण के तहत ग्रहण कर लें तो शायद मंच एक सुदृढ़ भविष्य को अपने हाथ में कर सकता है । उनके dwaraa ब्यक्त किए गए विचार सुदुर्गामी भविष्य की और इशारा करते हैं। आज इन्टरनेट पर मंच के प्रति विचार ब्यक्त करना ब्यक्ति विकास का हिस्सा है। लेकिन लगता है शीर्ष नेत्रित्व की उदासीनता ने न सिर्फ़ अजातशत्रु को बल्कि रवि अजितसरिया को भी निराश कर दिया है । मंच का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना कोई halaki फुलकी बात नही है। इसलिए हर सदस्य एक अधक्ष को अपने नजदीक पाना चाहता है । इसमे किसी तरह की शंका नहीं होनी चाहिए। मंच लोकतान्त्रिक ताकत को पहचानता है । इसीलिए तो शाखा स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक चुनाव प्रक्रिया का आदर किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर अधिवेशन ही एक मात्र जरिए है जब मंच की नीति निर्धारित की जाती है ,दिशा निर्देश जारी किए जाते है और फ़िर देश के युवा भी तो एक जगह एकत्रित होते है। आशा है मन में उठती हुई बैटन को दबाया न जाए शंका समाधान अवस्य किया जाए। किशोर कुमार काला

रविवार, 16 नवंबर 2008

oh! सब कुछ ऐसे ही चलता है

कमरे के अन्दर

बंद दरवाजा
खिड़की से झांकती आँखे
आसमान में उड़ते हुए पक्षिओं का
कलरव सुनकर
धड़कते दिल के सारे अरमान
बंद पंजरे के पंक्षी की तरह
पंख फडफडा कर रह जाते है
धुन्दते धुन्दते सागर का छोर
नदियों का संगम देख कर
गिरते हुए झरनों की
छलकती बूंदे
अहसास दिला देती है
मिट्टी में मिलकर विलीन होने का
सरसराती हुई हवा में
पेड़ की तरह झूमता हुआ
मतवाला हाथी
कुलांचे भरता खरगोश
टूटते हुए शिशु शिशु

खाद्खादते हुए खंडहर

मन की जर्जरता को

आंसूओं में डूबो देता है

खिलखिलाकर दौरता हुआ शिशु

लड़खादाकर गिरता हुआ पंगु

अपनी बेबसी पर

हंसते हुए लोगों के मनसूबे पर

दंत किटकिटाते हुए

सिसक-सिसक कर हाथ फैलाए

दुएँ मांगता चल देता है

अनेको बिचित्रतएं है संसार में

बंद पिंजरे में

बंद दरवाजा

खिड़की से झांकती आँखें

देखती है आसमान का नीलापन







मुझे भरोसा है (कबिता)
मुझे भरोसा है एक दिन वे लोग मान जायेंगे
आखिर है तो इंसान ही
अहिन्सा के पथ से भटक गए है वो लोग
इंसानी चीख से वे भी दहल जायेंगे
बकरे की अमा कब तक मनाएगी खैर
जब पकडे जायेंगे तब याद आ जायेगी नानी
चिथड़े चिथड़े होकर उडी थी उनकी देह
आए थे जानी अनजानी जगह से
न जाने संजोये होंगे क्या-क्या सपने
बस एक धडाम और हो गए सब चकनाचूर
इश्वर नही ले पाए तेरा नाम
कैसे कैसे नजारें है तेरी इस दुनिया के
पता नहीं कैसी कैसी दे रखी छूट
प्रकृति के साथ-साथ तेरी अनमोल कृति
मानव भी कितना बदल गया है
जानवरों सा दिमाग मानवों को भी 
देकरबना दिया है कितना बेरहम 
इसा ने कहा ,इन्हे माफ़ कर दे 
पता नहीं वे क्या कर रहे है
कवि कहता हैसब के ऊपर मानव ही सत्य है
मानव ही देव मानव ही सेवमानव बिन नहीं केव
फ़िर भी कैसा-कैसा बन गया है इंसान
पशु से भी बदतर हो गया है इंसान
नहीं हूँ हैरान 
मुझे भरोसा है
एक दिन सब बदल  जाएगा
शान्ति से रहना चाहेगा
प्रेम की गंगा में बह जायेगा
मेरे भरोसे की लाज रखना हे भगवन
सबको आख़िर आना है तेरे पास।
किशोर कुमार जैन
पर 6:45 AM 2 खुला मंच