बुधवार, 15 दिसंबर 2010

ओह फिर एक नया साल

किशोर कुमार जैन

ओह फिर एक नया साल

मेरी दहलीज में कदम रख रहा है

जाने किस चाह में

इस साल तो कल्पना की थी

संकल्प भी लिया था

कि गुजारुंगा शांति और क्षमा भाव से

लेकिन महंगाई की मार ने कर दिया सब चौपट

नहीं संभाल पाया अपने आपको

गुस्से और अधीरता ने

तिरोहित कर दी मेरी भावनांए

जो देती थी मुझे हौंसला

एक के बाद एक मिली घोटाले की

खबरों ने छीन लिया चैन

शान से कमाया नाम खेल कूद में

लेकिन भ्रष्टाचार ही रहा शीर्ष पर

जिस में अव्वल रहे हम

आसमान भी छुएंगे

नापेंगे पाताल की गहराई

देगे दुनिया को सबसे बड़ा बाजार

भूखे नंगे देश में योंहि सब चलता रहेगा

हर साल नये साल का धूम-धड़ाका

हमारे कानों में गूंजता रहेगा

चमक दमक के सामने चुंधियाती रहेगी आंखे

साल फिर भी बदल जाएगा

नए संकल्प अधुरे सपनों के साथ