ओह फिर एक नया साल
किशोर कुमार जैन
ओह फिर एक नया साल
मेरी दहलीज में कदम रख रहा है
जाने किस चाह में
इस साल तो कल्पना की थी
संकल्प भी लिया था
कि गुजारुंगा शांति और क्षमा भाव से
लेकिन महंगाई की मार ने कर दिया सब चौपट
नहीं संभाल पाया अपने आपको
गुस्से और अधीरता ने
तिरोहित कर दी मेरी भावनांए
जो देती थी मुझे हौंसला
एक के बाद एक मिली घोटाले की
खबरों ने छीन लिया चैन
शान से कमाया नाम खेल कूद में
लेकिन भ्रष्टाचार ही रहा शीर्ष पर
जिस में अव्वल रहे हम
आसमान भी छुएंगे
नापेंगे पाताल की गहराई
देगे दुनिया को सबसे बड़ा बाजार
भूखे नंगे देश में योंहि सब चलता रहेगा
हर साल नये साल का धूम-धड़ाका
हमारे कानों में गूंजता रहेगा
चमक दमक के सामने चुंधियाती रहेगी आंखे
साल फिर भी बदल जाएगा
नए संकल्प अधुरे सपनों के साथ