सोमवार, 14 दिसंबर 2009

माँ ही तो बुध
किशोर कुमार जैन
मैंने हर बार सोचा है चाँद को छु लूँसोच पर नहीं है कोई लगाममाँ कहा करती थी बेटा चाँद पर जाना नही है कोई हँसी खेलमेरे विचार भी अलग नहीं थे माँ सेमाँ मान नहीं रही और मैं विश्वास नहीं दिला पा रहाकी चाँद पर भी लोग रहेंगेमाँ विश्वास करती है स्वर्ग -नरक परपाप पुण्य पर जो मिलते है इस धरा पर स्वर्ग - नरक माँ की कल्पना नही है कहती है अच्छा करोगे तो पाओगे स्वर्ग बुरे कर्मों की बुरी है सजा, दूर इनसे रहा करो मै भी माँ की सुनता हूँमन की करता हूँ नहीं जानती इसी धरा पर मै नरक के दुख भोग रहा हूँउसके बुद्ध मन की ठेस टीस में न बदल जाएइसलिए सब भोग रहा हूँ बिना सिसकेमाँ के साथ दिन बीता रहा हूँ अपनाकष्ट सह कर भी उसकी आँखे पूछ रही होती हैकहीं कोई तकलीफ तो नहीं.