बुधवार, 3 जून 2009

अनाहूत सपने

आजकल नए-नए सपने
खड़ी करते है परेशानी
दौड़ने लगते है अविराम
कल्पना के घोडे
ब्रह्ममुहरत के सपने
सुना था होते है सच
जाने की कितनी कोशिस
लेकिन था सब निरर्थक
डूबे जा रहा हूँ अन्धकार कुँए की
असीम गहराई में
न ही कोई धरातल
न ही कोई सहारा
फ़िर भी नहीं कोई अंत
सुख भोगता है मन
कल्पना की उड़ान में
सच मानता है मन सपनों को ही
देखता है जिन्हें जागती आँखों से
लिखता हूँ कविताएँ एक
वजूदहीन ब्यक्ति की तरह
सपनों को ही सच मानकर
वजूद खोजता हूँ अपना 0

कोई टिप्पणी नहीं: