शनिवार, 24 जनवरी 2009
पोषक सदस्यों को अभिभावक सदस्य क्यों नहीं
बिल्कुल सही है ये सवाल। पोषक सदस्य के रूप में जो सेवाएँ ली जानी चाहिए उस तरह से उनका उपयोग नहीं लिया जा रहा। एक तरह से निराशाजनक स्थिति है । ख़ुद पोषक सदस्य भी भ्रम की स्थिति में है । सही चिंतन न होने की वजह से इस कार्य को करने में काफी मशक्कत करनी होगी चूँकि संविधान में इस तरह का कोई प्रावधान नही है।अतः मेरे विचार से एक सलाहकार के रूप में उनकी सेवाएँ ली जानी चाहिए। मंच के कार्यक्रम की सूचि में कई समितियां अलग अलग काम करती है । उनमे भी सलाहकार के रूप में उनसे मशविरा किया जाना चाहिए । इस तरह उन्हें सक्रिय बनाए रखने की पहल की जा सकती है। सामाजिक सरोकारों में उन्हें आगे रखकर उनका मार्गदर्शन लिया जा सकता है ।जब कभी समाज या इतर समाज के साथ मेल मिलाप अथवा सामाजिक संपर्क मजबूत बनाए रखने की प्रक्रिया हो तो पोषक सदस्यों की सहयोगिता बहुत लाभप्रद सिद्ध हो सकती है. किशोर कुमार जैन
बुधवार, 14 जनवरी 2009
अजय धानुका
आज मेरे लिए एक बहुत ही स्मरणीय दिन रहा । आज मेरी कबिताओं का पाठ गुवाहाटी दूरदर्शन के एनई कार्यक्रम में दिखाया गया । मैंने इस कार्यक्रम का आनंद अपने मित्र अजय धानुका के यहाँ उठाया। मेरे साथ बिशिस्त हिन्दी लेखक सावरमल संगनेरिया भी साथ थे। इसी दौरान कई लोगों से बातचीत हुई सभी ने कार्यक्रम को सराहा । इसीलिए आज का दिन मेरे लिए यादगार रहा। किशोर कुमार जैन
मंगलवार, 13 जनवरी 2009
कौन से कार्यक्रम को प्राथमिकता देने जा रही है नईसमिति
राष्ट्रीय अधिवेशन कुशलता पूर्वक सम्पन्न हो चुका है। मेजबान शाखा एक और अपनी थकान मिटने में लगी होगी तो दूसरी और नई समिति एक नई उर्जा के साथ नई रणनीति बनाने में जुटी होगी। दोनों ही बातें अपनी-अपनी जगह सही है लेकिन मेजबान शाखा का दायित्व एक तरह से इस बात के साथ ख़तम हो जाता है की उन्होंने एक नया राष्ट्रीय अध्यक्ष हमें दे दिया है और अब बाकि के समय में उसे युवा साथियों के साथ मंच दर्शन के प्रति समर्पित होकर खरा होकर दिखाना है। मंच अपने स्थापना काल से ही चुनौतियोंका सामना करते आया है और नई उसके रास्ते में खड़ी रही है। बावजूद इसके की मंच आज रजत जयंती के द्वार तक पहुँच चुका है। कुछ बातों पर पर तो तुंरत ध्यान देना जरुरी है। पहली बात के टूर पर में जिस बात कीऔर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ वह है राष्ट्रीय मुखपत्र मंचिका को पुनः अपने स्थान पर लाना । देख रहा हूँ की मंचिका अब सिर्फ़ एक स्मारिका बन कर रह गई है। जबकि एक स्मारिका और मुखपत्र में फर्क समझा जाना चाहिए। मुखपत्र के रूप में मंचिका के ऐतिहासिक गौरव की गरिमा को वापस लौटा लाने की जरुरत महशुस कर रहा हूँ। आशा है नव नेतृत्वा इस पर गहरैपूरावाकविचार करेगा । आगे फ़िर पुनः चर्चा करेंगे। किशोर कुमार जैन
२००९ सन (कविता )
एक पुराने वर्ष का अंत
और एक नए वर्ष का शुभारम्भ
आशा और प्रत्याशा का वर्ष
किसी के लिए दुःख और बिषाद का वर्ष
और किसी के लिए हर्ष और उल्लास का
आडे तिरछे चित्रों के बीच
टटोल रहा था पुरे वर्ष
शान्ति की राह
बिदाई की बेला में
२००८ सन सिसक रहा था
बेबसी में रो रहा था
शोक में टूट गया था
फ़िर भी स्वागत कर रहा था
एक नए स्वर्णिम अध्याय का
पृष्ठ खोलने के लिए
२००९ सन का
kishore kumar jain
और एक नए वर्ष का शुभारम्भ
आशा और प्रत्याशा का वर्ष
किसी के लिए दुःख और बिषाद का वर्ष
और किसी के लिए हर्ष और उल्लास का
आडे तिरछे चित्रों के बीच
टटोल रहा था पुरे वर्ष
शान्ति की राह
बिदाई की बेला में
२००८ सन सिसक रहा था
बेबसी में रो रहा था
शोक में टूट गया था
फ़िर भी स्वागत कर रहा था
एक नए स्वर्णिम अध्याय का
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२००९ सन का
kishore kumar jain
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