शनिवार, 17 दिसंबर 2011

सागर सा है मन
किशोर कुमार जैन

हूँ, सोच रखा था मैंने की कुछ बन जाउंगा
लेकिन गिरते पड़ते इस जहाँ में
जहाँ डगमगा जाते हैं कदम
वहां कितना कठिन होता है
अपने आपको
टिकाए रखना
किताबों की दुनिया से निकल कर
मानों एक और दुनिया खोज ली हो
कोलंबस की तरह
लेकिन खड़े रहकर भी अपनी जानी पहचानी
जगह भी बन गई थी बेगानी

अनजाने माहौल के अजनबी लोग
पहचान तो लिया था मैंने
मतलब की दुनिया में
वे ही मुँह फेर के चल दिए
सागर की लहरे टूटती रही
बिखरती रही कहती रही
मुझे ही देख लो
कहाँ ढूँढ पाई हूँ अपना ठिकाना
मगर मेरी तलाश जारी है
मुर्दे के दिल में धड़कन ढूँढने के लिए
अपने ठिकाने की चाहत में
कोई संगम तलाश लूँगा
त्रिबेनी की तरह

रविवार, 29 मई 2011

मेरे पापा

पापा आत्मप्रशंसा से हमेशा दूर रहे. उन्होने कभी डींगे नहीं हाँकी. बलिक यह तक भी अपने पुँह से जतलाने की कोशिस तक नहीं कि विजयनगर के नव निर्माण में उनका कितना योगदान रहा है. पापा अब 80 के ऊपर चल रहे है. पापा जब 12 साल के थे तभी उनके कंधो पर पूरे परिवार की जिम्मदारी आ पङी थी। उनके तीन छोटे भाई तथा 6 बहने हैं। 12 साल की उम्र में पिताजी गौरीलाल जी साया उठ गया था। लेकिन जीवन का संघर्ष करने में कभी हार नहीं मानी. परिवार की जिम्मेदारी के साथ साथ उन्होंने समाज के कार्यों में भी अपना भरपूर योगदान दिया। इलाके के सभी लोगों में वे लोकप्रिय थे। भाईयों को स्थापित किया बहनों की शादी की फिर अपने पांच बेटों दो बेटिंया भाईयों के बेटे बेटियों की चिंता में उन्होंने अपने सारी उम्रगुजार दी। कई बर्षों तक वे उपरहाली हाईस्कूल की प्रबंधकारिणी समिति के सरकारी प्रतिनिधि थे। विजयनगर के मंदिर,स्कूल,धर्मशाला,औषधालय आदि के निर्माण में भी उनका सहयोग रहा। कई बर्षों तक वे श्री दिगंबर जैन स्कूल की की ब्यवस्थापना समिति के मंत्री व अध्यक्ष बने रहे. सरकारी कागज पत्रों मे वे आज भी विजयनगर की समाज के एकमेव मंत्री हैं जब कि आध्यक्ष मे किसी नाम दर्ज नहीं है। 1976 व 1978 में विजयनगर में हुए ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के निर्विवाद तौर पर मंत्री पद पर काम किया . कक्षा 4 तक पढे पापा का एकाउंट्स का काम भी गजब का रहा. हिसाब किताब के काम में कहीं कोई गफलत नहीं की थी। लेकिन कभी किसी तरह के सम्मान के वे लालसी थे न ही आग्रही थे. पापा निरहंकारी है।.आत्मस्वाभिमानी है। न तो अपने ब्यापार में उन्होने किसी तरह की कोई बेईमानी की सहारा लिया। भाईयों के प्रति भी वे इमानदार बने रहे। अपने हिस्से के प्रति न सोचते हुए पहले भाईयों के लिए ही सबकुछ करते रहे।
पापा एक सांस्कृतिक कर्मी भी थे . बचपन में वे नाटकों में भी भाग लिया करते थे.अपने जीवन में उन्होने कई उतार चढाव का बी सामना किया। पलाशबाङी में दो बार उनका मकान ब्रह्मपुत्र की भेंट चढ गया। एक बार भीषण आग से बी वे तबाह हो गए थे। फिर दादाजी ने जब विजयनगर की स्थापना की। तब विजयनगर के विकास में बी वे लगे रहे. सन 1968 में दंगाईयों की चपेट एकबार फिर पापा ने सब कुछ खो दिया. लेकिन बिना घबराए अपने परिवार के साथ घाँव वालों की हिम्मत बंधाते रहे. 1950 के हुए विनाशकारी भूकंप के भी वे प्रत्यक्षदर्शी हैं।
कई बार उनहोंने छोटे बङे तीर्थों की दुर्गम परिस्थतियों में यात्राएं की है. यात्रा के दौरान उनके रोमांचकारी अनुभवों को सुनकर हमलोग दांतो तले उंगलिया दबा लेते हैं। आज की सहज होती यात्रा को देखते हुए पहले की यात्रा के बारे में सुनकर अचरज सा लगता है. वर्तमान के सामान की कीमत को देखकर वे भी यह अंदाज लगा लेते है कि दुनिया कँहा से कँहा पँहुच गई। समाज मे आसपास के गाँवो में उनका एक दबदबा था. आज की युवा पीढी के नैतिक स्खलन को देखकर उम्हें दुख होता है. युवावों को सामाजिक कार्यों के लिए वे उत्साहित करते हैं.कभी भी उन्होंने किसी काम में हस्तक्षेप भी नहीं किया,दखलंदाजी नहीं की. सरकारी अफसरों से उनकी अच्छी पैठ होते हुे भी कभी नाजायज फायदा नहीं उठाया. समाज के कामों में सरकारी मदद लेने में कभी गुरेज भी नहीं किया। दादाजी के सिध्दांत दे होबो दे को वे आज भी मानते है. धैर्य व शांति के साथ वे अपना काम भी करते रहे और लोगों के सलाह भी देते रहे.

रविवार, 15 मई 2011

बेमतलब गुजरता है जीवन
किशोर कुमार जैन

ओह उलझ सा गया हूँ मानसिक जंजालो मे
मकङी के जाल में फंसे पतंगे की तरह
अनसुलझी समस्याओं मे
पानी में उठते भँवर ने
धकेल दिया है पाताल में

सागर की लहरों के थपेङों सी
उतर चढ रही है जिंदगी
किसी एक पङाव की तलाश में
बहते जा रहें हैं जीवन के सातों रंग
धुंधलाती आंखो में झलक रहे हैं सपने
भंग होती आशाओं की तरह.

दो पहियों पर जीवन की गाङी
डगमगाती चलती जा रही है
टूटी-फूटी सङकों पर उद्देश्यविहीन
जीवन का मतलब खोजते
जिंदगी बन गयी है खण्डहर

पहाङ की तलहटी में गिरता हुवा झरना
बौछारे छिङकता पानी
दे देता है जीवन को एक नया रुप
उङता हुवा गुलाल
छोङ जाता है जीवन का बुढाता सौंदर्य.