शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

कब तक ढूंढता रहूंगा

कविः किशोर कुमार जैन

हां ये सच ही है
तलाश किसी की पूरी नहीं होती
और तो और ये साल भी गुजर गया
फिर भी खोजता रहता है मन
बाजार में,पार्क में, राह चलते, सिनेमा हाल में
अखबार में,किताब में, शास्त्र में
और न जाने कंहा-कंहा

और नये साल की शुभ बेला में
चांद की ओर ताकते हुए
सूरज की तपन में तपते हुए
बारिस की शीतल बौछार में
वैश्वायन की हवा में कहीं
अपने आप ही उङता चला आये
इसी आस में ताकता रहा आसमां को

आखिर कहीं तो अंत होगा
कहीं तो कुछ मिलेगा
शायद कोई फकीर ही बता दे
या फिर किसी भिखारी को ही पुछ लूं
उङता हुवा पक्षी भी तो कुछ जानता होगा

एक हसीना ने कहा मेरे सौंदर्य मे खोज लो
साधु ने कहा शायद मेरी तपस्या में मिल जाए
कवि ने कहा कविता मे भी तो हो सकता है
होने को तो किस्से-कहानियों में भी तो हो सकता है
लेकिन तनाव भरी जिंदगी में कुछ भी तो ठीक नहीं रहता

तलाश तो ताजिंदगी जारी रहेगी
किसी एक में या अनेक में........
इस साल नहीं तो अगले साल

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