बंद दरवाजा
खिड़की से झांकती आँखे
आसमान में उड़ते हुए पक्षिओं का
कलरव सुनकर
धड़कते दिल के सारे अरमान
बंद पंजरे के पंक्षी की तरह
पंख फडफडा कर रह जाते है
धुन्दते धुन्दते सागर का छोर
नदियों का संगम देख कर
गिरते हुए झरनों की
छलकती बूंदे
अहसास दिला देती है
मिट्टी में मिलकर विलीन होने का
सरसराती हुई हवा में
पेड़ की तरह झूमता हुआ
मतवाला हाथी
कुलांचे भरता खरगोश
टूटते हुए शिशु शिशु
खाद्खादते हुए खंडहर
मन की जर्जरता को
आंसूओं में डूबो देता है
खिलखिलाकर दौरता हुआ शिशु
लड़खादाकर गिरता हुआ पंगु
अपनी बेबसी पर
हंसते हुए लोगों के मनसूबे पर
दंत किटकिटाते हुए
सिसक-सिसक कर हाथ फैलाए
दुएँ मांगता चल देता है
अनेको बिचित्रतएं है संसार में
बंद पिंजरे में
बंद दरवाजा
खिड़की से झांकती आँखें
देखती है आसमान का नीलापन
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें