सोमवार, 17 नवंबर 2008

मंच की भलाई ही सर्वोपरी है

मंच से मेरा गहरा लगाव है । क्योंकि मंच ने मुझे बहुत कुछ दिया है। जितना कुछ मंच से मुझे मिला है उतना मैंने मंच को नहीं दिया है । यह बात कहने अगर मैं संकोच करता हूँ तो कृतघ्नता होगी। इसलिए दुखी हो जाता हूँ जब कोई मंच के बारे में बुरा भला कहने की कोशिश करता है। लेकिन मैं इस बात से भी परेशां होता हूँ जब कूछ सवाल जो की मंच हित में रखे जाएँ और उनका सही-सही जवाब नहीं मिले। मंच आज भी अपनी लय और गति से आगे बढ़ रहा है यह जानकर खुशी होती है। मंच ने समय को पहचाना है और उसी के साथ चलने की कोशिश भी करता है,फ़िर भी पता नहीं क्यों अनचाहे ही संबाद हीनता की स्थिति आ जाती है। बिनोद रिंगानिया एक समझदार एवं जागरूक पत्रकार है । मंच के प्रति उन्होंने हमेशा ही एक सद्भावना के तहत अपने विचार ब्यक्त किए हैं। अधिवेशन को लेकर उनके uthae गए सवालों को सवाल न मानकर अगर नीति निर्धारण के तहत ग्रहण कर लें तो शायद मंच एक सुदृढ़ भविष्य को अपने हाथ में कर सकता है । उनके dwaraa ब्यक्त किए गए विचार सुदुर्गामी भविष्य की और इशारा करते हैं। आज इन्टरनेट पर मंच के प्रति विचार ब्यक्त करना ब्यक्ति विकास का हिस्सा है। लेकिन लगता है शीर्ष नेत्रित्व की उदासीनता ने न सिर्फ़ अजातशत्रु को बल्कि रवि अजितसरिया को भी निराश कर दिया है । मंच का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना कोई halaki फुलकी बात नही है। इसलिए हर सदस्य एक अधक्ष को अपने नजदीक पाना चाहता है । इसमे किसी तरह की शंका नहीं होनी चाहिए। मंच लोकतान्त्रिक ताकत को पहचानता है । इसीलिए तो शाखा स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक चुनाव प्रक्रिया का आदर किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर अधिवेशन ही एक मात्र जरिए है जब मंच की नीति निर्धारित की जाती है ,दिशा निर्देश जारी किए जाते है और फ़िर देश के युवा भी तो एक जगह एकत्रित होते है। आशा है मन में उठती हुई बैटन को दबाया न जाए शंका समाधान अवस्य किया जाए। किशोर कुमार काला

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