बेमतलब गुजरता है जीवन
किशोर कुमार जैन
ओह उलझ सा गया हूँ मानसिक जंजालो मे
मकङी के जाल में फंसे पतंगे की तरह
अनसुलझी समस्याओं मे
पानी में उठते भँवर ने
धकेल दिया है पाताल में
सागर की लहरों के थपेङों सी
उतर चढ रही है जिंदगी
किसी एक पङाव की तलाश में
बहते जा रहें हैं जीवन के सातों रंग
धुंधलाती आंखो में झलक रहे हैं सपने
भंग होती आशाओं की तरह.
दो पहियों पर जीवन की गाङी
डगमगाती चलती जा रही है
टूटी-फूटी सङकों पर उद्देश्यविहीन
जीवन का मतलब खोजते
जिंदगी बन गयी है खण्डहर
पहाङ की तलहटी में गिरता हुवा झरना
बौछारे छिङकता पानी
दे देता है जीवन को एक नया रुप
उङता हुवा गुलाल
छोङ जाता है जीवन का बुढाता सौंदर्य.
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